अपनों के साथ शतरंज न खेले

      बचपन मे हर एक को खेलना अच्छा लगता है| बाल्यावस्था से वृद्ध अवस्था तक हर एक को कोई न कोई खेल खलेना या देखना पसंद होता है| क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल से लेकर शतरंज, ताश कई खेल हम खेलते है, उसका मजा लेते है| कुछ खेल कई मिलकर खेलते है तो कई एक दुसरे मे खेले जाते है| खेल कोई भी हो लेकिन हार-जीत, लाभ-हानी यह तो होता ही है| एक जीतता है तो दूसरा हारता है| हमेशा एक ही जीते ऐसा नही, कभी हार तो कभी जीत होती रहती है| जो भी खेल का परिणाम हो उसे सहर्ष स्वीकार करना समझदारी है| परंतु कई बार ये भी देखते है की खेलते-खेलते कई खिलाडी आपस मे ईर्ष्या करना या बदला लेने की चाहना रखते है| खेल के नियमों को तोडकर बदला लेते है| ऐसी कई बाते होते हुए हम देखते है|

    ‘LIFE IS A GAME’ हमारे जीवन मे भी वही होता है| वास्तव मे परिस्थितीया एक खेल है| हमे उसे खेल समझकर खलेना है न की जिस व्यक्ति से परिस्थिती आई है उसके साथ नफरत या बदले की भावना रखते  है| लेकिन व्यावहारिक जीवन मे आज हमसे ये गलती   कही ना कही हो जाती है| इस जीवन के खेल का नियम है ‘जो जैसा करेगा उसे वैसा मिलेगा’| इस नियम को भूल हम उनसे बदला लेना, गुस्सा करना, नफरत करना शुरु करते है और यह सब करना सही भी समझते है| आज किसीको धोके मे रखना, धोका देना यह तो बिल्कुल साधारण सी बात हुई है| और ये सारे खेल जो हमारे बहुत निकट के है, जिन के अंग संग रते है उन्ही के साथ खेलते है| इसलिए आज के संबंध जटिल बनते जा रहे है| पती-पत्नी, बालक-पालक, मित्र-संबंधी ये सारे संबंध सुख देने-लेने के लिए बने है, दुःखों मे साथ निभाने के लिए है लेकिन आज इन्ही संबंधो मे हम धोका देते है| अपनो के साथ ही शतरंज खेलते है|

     आज कल विज्ञान ने कई प्रभावी साधन दिए है जिससे  हम संबंधो को मजबूत और गहरा बना सकते है| लेकिन उसका इस्तमाल हम गलत तरीके से करते है| facebook से हम कई मित्र बना लेते है| लेकिन अपनी सही पहचान न देकर झुठ, कपट करते है| दुसरे नाम से अपनो के साथ ही छल करते रहते है| रिश्तो मे विश्वास बढाने के बजाए और ही रिश्तो से विश्वास उठता जा  रहा है| इसलिए कहते है इन्सान को पहचानना बडा मुश्किल है| जो ऐसे दुसरो के साथ खेल करते है वह तो उन बातो का मजा लेते है, सामनेवाले की भावनाओ के साथ खिलवाड करते है| मगर ‘आज मजा और कल सजा’ जरूर मिलती है| क्योकि इस जीवन का नियम है ‘जैसा करोगे वैसा पाओगे’| भले किसी को सही रूप से पहचाने मे समय लगता है लेकिन हमने जो उनका समय, संकल्प, शक्ति को गलत तरीके से नष्ट कीया, उसका भी तो कर्म का खाता बनता है| सुख देंगे तो सुख मिलेगा और दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा यह तो है ही लेकिन हमारे कारण किसी की भावनाओ को ठेच पहुचती है या मन दर्द का अनुभव करता है तो उसका भी रिटर्न हमारे पास आज नही तो कल आएगा| बोल से दुःख दिया तो बोल से ही दुःख मिलता है वैसे ही संकल्पो से दुःख दिया तो हमारा मन कभी खुशी का अनुभव नही कर सकता, मन उलझा हुआ रहेगा| इसलिए व्यक्तिओंके साथ ऐसा छल (खेल) न करे|

      यह जीवन खेल समझकर जरूर खेले अर्थात जब कोई बात आती है, तब उसे पार करने के लिए हम अपनी सारी शक्ति, बुद्धी लगाए| फिर उसके परिणाम को भी स्वीकार करे| आगे क्या करना है उसकी समझ बढाकर अब कैसे खलेना है उसे समझ ले| लेकिन किसी  व्यक्ति विशेष के लिए मन मे गांठ बांधकर न चले| वास्तव मे हमारी कश्मकश बुराईओ के साथ है न की व्यक्तिओं के साथ| हमने महाभारत मे भी देखा की खेल खेलते कहा रणभूमी तक पहुचे| एक दुसरे से बदला लेने के लिए आमने सामने आये| यह सारे दृष्टान्त हमारे जीवन से जुडे हूए है| अगर कुछ हारने की शक्ति नही है या खेल की समझ नही है तो ऐसे खेल से दूर रहे| अर्थात जीवन मे जो है, जैसा है उसे स्वीकार करके उसीमे गुजारा करे| अगर कुछ पाना है तो खेल मे उतरे| कभी हार या जीत हो उसे दिल से स्वीकार करना भी सिख ले |

      हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण है जिन्होने अपनी जीवन मे कई बार हारने का अनुभव कीया| लेकिन फिर भी उस हार से सिखकर आगे बढे| कोई वैज्ञानिक, |       व्यापारी, कलाकार, खिलाडी बने| हर मिश्किल परिस्थितीओं को पार करके दिखाया| अपने अपने क्षेत्र मे विशेष बनकर दिखाया लेकिन कर्मो मे झुठ, कपट, छल को नही अपनाया| उन्हे पता था अच्छा कर्म हमेशा मन को सुगून देता है और छल बैचैनी| जीवन का आनंद तब है जब अपनो के सामने हारकर उनकी जीत की खुशी मनाए|

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दृढता

वर्तमान समय हर मनुष्य समस्याओ के चक्रव्यूह मे घिरा हुआ दीखाई देता है| यह कोरोना काल जैसे परीक्षा काल बन गया है| इस समय आनेवाली नवनवीन समस्या हमारे अंदर की शक्तीयो को, गुणो को टटोल रही है| ऐसे मे सभी समस्याओ को शांती से पार करना एक चुनौती बन गयी है| अचानक नौकरी का इस्तिफा हाथ मे आ जाता है तब आगे जीवन मे क्या करे, कैसे करे, कहा जाये.. ऐसे कई सवाल खडे हो जाते है| लेकिन उस समय पर अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना , फिर से नई शुरुवात करना उसके लिए दृढता आवश्यक है| कोई भी प्रकार की समस्या हो या चुनौती हो उसको पार करने के लिए दृढता की जरूरत है| कुछ कर दीखाने का हौसला हो| कभी-कभी हम परिस्थितीयो के वार से थक जाते है, अपने आपसे ही पूछते है आखिर कब तक? लेकिन इसका जवाब है ‘ अंत तक ’| जब तक जीना है, परिस्थिती का सामना अंतिम सांसो तक करना है इसलिए अपनी दृढता को बनाए रखे|

दुनिया मे ऐसे कई लोग होकर गये जिन्होने जन्म से ही परिस्थितीयोको झेला लेकिन सभी के सामने एक उदाहरण बन गये, जैसे ‘जेसीका कॉक्स’| जिनको जन्म से ही दो हाथ नही थे लेकिन महिला पायलट के रूप मे जाना जाता है| उसके साथ कराटे, पियानो भी सीखे| वह कहते है की ‘मैने कभी ये नही सोचा की मुझे हाथ नही है तो क्या करू लेकिन जिनको हाथ है वो जो नही कर सकते वह सबकुछ कर दिखाऊ ये सोच रखी| हाथ न होने का गम कभी महसुस नही किया|’ वो अपने सारे कार्य दो पैरो के बल पर करते है| जन्म से ही कुछ कमीयो को लेकर आये लेकिन ऊन कमीयो पर मात कर के दिखायेगे यह दृढता आज उन्हे जीवन मे सफल होने का एहसास करा रहे है| इसलिए कहते है ‘दृढता सफलता की कुंजी है’| सारे बंद तालो को खोलने की चाबि है|

ईन्सान का जीवन ‘साप सिढी’ के खेल की तरह है| कब कोई कहा से उपर चढ जाता है और कब कोई कहा से नीचे गिर जाता पता ही नही चलता| लेकिन कितने भी उतार-चढाव आये फिर भी जीवन पथपर चलते रहने की दृढता जरूर हो| कोई समस्या आने के बाद अगर व्यर्थ की चिंता मे फॅस गये तो वह परिस्थिती हमे बहुत बडी लगने लगती है| लेकिन मन मे संकल्प किया की ‘कोई बात नही इसे भी पार कर लेंगे’ तो यह सोच ऑक्सीजन का काम करती है| रुकी हुए सांसे चलने लगती है| कयू, क्या, कैसे, कब, कहा यह सारे सवाल हमारी उम्मीदो की सांसो को रोक लेते है| इसलिए सर्वप्रथम हम अपने मन को शांत रखे| क्युकी शांत मन हर समस्या का समाधान दिलाता है| जैसे पानी जितना स्थिर और स्वच्छ होता है उसके अंदर की हर चीज स्पष्ट दिखाई देती है वैसे ही हमारा मन अगर स्थिर और विचार शुद्ध, सकारात्मक है तो हर उलझन का उपाय दीखाई देता है, सही राह मिल जाती है| और सही राह पर चलने की दृढता हमारे मे है तो पहाड जैसी परिस्थिती को भी सहज पार कर सकते है| इसलिए विजयी होना है तो दृढता को बनाए रखे|

निरंतरता और दृढता यह सफलता पाने के दो आधार है| जैसे नवरात्रि मे कोई नौ दिन उपवास करते है, कोई एक दिन ही कर पाता है| जिन्होने लक्ष तक पहूचने का पक्का संकल्प किया हो वही दृढता से कर पाते है| जीवन मे भी तन की स्वस्थता के लिए व्यायाम करना हो या गलत आदतो को मिटाना हो या कुछ पाने के लिए की गयी मेहनत हो हर एक को बरकरार रखने के लिए दृढता का होना जरूरी है|

‘कुछ कर दिखायेगे’ यह दृढ संकल्प हमे आगे बढाता है| हारे हुए ईन्सान को चालणे का सहारा देता है| इसलिए समस्याओंसे डरे नही| कभी निराशावादी न बने| मनुष्य जीवन एक परीक्षा हॉल है| यहा हर एक को हर प्रकार की परीक्षा देनी है| अपनी मंजिल पर समय पर पहुचना हो तो दृढता का हाथ पकडकर चलते चले|

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बदला नही लेना किसी से, बदल के हमको दिखाना है

‘बचपन के दिन भूला न देना, आज हसे कल रूला न देना..’ भले हम कितने भी बडे हो जाये लेकिन बचपन के दिन भुला नही पाते, हसने और रोने के दिन| छोटेपन मे जब खेलने जाते थे और कभी किसी से हातापायी होती थी, रोते हुए घर आते थे तो कहते थे की कभी किसी का मार खाके नही आना | मार खाना माना कमजोर| कभी कमजोर नही रहना| ऐसी शिक्षाए अकसर मिलती थी| सामनेवाले को सबक सिखाना माना बहादुरी ऐसा हम सभी का मानना है| ‘tit for tat’, तभी समझ नही थी| वो बाते सही लगती थी| लेकिन आज जब कर्मो के गहरे राज समझ रहे है तब वो बाते गलत लग रही है| हम समाज मे भी ज्यादातर ऐसे लोग देखते है जो इट का जवाब पत्थर से देना जानते है| लेकिन ऐसे भी लोग दुनिया मे है जिन्होने पत्थर का जवाब फूल से दिया है|

     एक सत्य घटना हमारे सामने है| एक मुस्लिम महिला जिसका नाम रुकिरा है| उसका बेटा सुलेमान जब चौदा साल का था तब किसी बच्चे ने चंद रुपयो और अन्न के लिए उसका खून कर दिया| खूनी बच्चे की उम्र सिर्फ ८ साल की थी| रुकिरा को अपने बच्चे के खून का बहुत दुःख हुआ| लेकिन उसने उस बच्चे को माफ कीया| उसको १४ साल की कैद भी हुई लेकिन उस दौरान वह उस बच्चे से मिलने भी जाती थी| जब वह बच्चा जेल से बाहर निकला तब उसने उसे अपना बच्चा बना लिया| आज वह दोनो आमने सामने रहते है| कहने का भाव यह की गलत कर्मो की सजा हम किसी को क्या दे? लेकिन ईश्वर ने हमेशा क्षमा करना सीखाया है| क्या हम किसीकी गलती को जल्दी माफ कर पाते है? बडी बाते तो छोडो लेकिन छोटी छोटी बातो का भी बदला लेने की चाहना रखते है| मन मे उसी तरह के ख्यालात रखते है| अपने को भी वही समझाते है की ‘यह बात तो सही है की कोई मेरा नुकसान करे तो मुझे भी उसके साथ वैसा ही करना चाहिये| हम साधारण मनुष्य है, महान नही’| ऐसे सोचकर हम गलत कर्म करने की छुट्टि दे देते है| लेकिन सही कर्म करने की शक्ति नही रखते|

     कभी सोचकर देखे की कोई हमारे साथ ऐसा व्यवहार कयू करता है? शायद कभी हमने भी उससे वैसा वर्तन कीया होगा| आज वह लौटा रहा है तो हमे वह मंजूर नही| हम सिर्फ वर्तमान को देख वैसा कर्म कर लेते है| मगर सच तो यह है की कर्म का हिसाब तो कई जन्मो का है| जब तक वह चूक्त नही करते तब तक वह हमारे सामने रूप बदल कर आते रहेंगे| इसलिए समझदारी इसीमे है की उसे जल्दि चूक्त कर रवाना करे| यह गुह्य राज है की ‘ कोई तब तक आपको दुःखी या नुकसान करेगा, जितना आपने उसका कीया है’ लेकिन इस बात की जानकारी न होने के कारण हम आज ‘tit for tat’ के अनुसार चल रहे है| खुद भी दुःखी और औरों को भी दुःखी करते रहते है|

     जब ऐसे कोई कर्म बंधन सामने आये तो कुछ समय अर्थात जब तक परिस्थिती थंडी न हो तब तक मौन रखना, दूरी बनाए रखना यह समझदारी है न की उनसे उलझना| हम जितना हो सके react न करे| क्योकि react करने से वह दुःख की लेन-देन और बढती रहेगी| ये कर्मबंधन अर्थात ही किसी आत्मा से लिया हुआ कर्ज जो उसे लौटाना पडता है| ये कर्ज सुख और दुःख दोनो का होता है| ‘ जो हम देंगे वही हम पायेंगे’ यह कर्म का नियम है| सुख देंगे तो सुख मिलेगा, दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा| हमने औरों को क्या दिया वह हमे याद भी नही रहता परंतु जब बाते सामने आती है तो इस नियम को भूल जाते है|

      इसलिए हमे धैर्यता और समझदारी से इस राह पर चलना है क्योकि आखिर हर एक को अपने साथ अपने कर्मो को ही लेकर जाना है| बदला लेंगे तो सामनेवाला भी वही हमारे साथ कारेगा| लेकिन अगर हम बदलकर दिखायेंगे तो अन्य को भी बदलने की प्रेरणा मिलेगी और हम भी कर्म बंधनो से मुक्त हो जाएंगे|

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चला करूया एक नवी सुरुवात

आज नवीन वर्षाचा पहिला दिवस, सर्वांच्याच मनात आशेची नवीन किरणे घेऊन येणारा हा दिवस. २०२० बघता बघता काळाच्या गर्भात विरून गेले. पण जीवनात अनपेक्षित बदल घडवून आणणारे हे वर्ष नक्कीच सर्वांच्या लक्षात राहणारे ठरले. ह्या कोरोंना ने आपल्याला खूप काही शिकवले. ‘वेळ पडली तर मनुष्य सर्व काही शिकतो’ ह्याचे प्रत्यक्ष रूप बघायला मिळाले. जी कामे कधीही केली नव्हती ती सर्व ह्या लॉक डाउन मध्ये करायला लागली. काहीनी त्याचा आनंद घेतला, तर काहींनी ‘मजबूरी का नाम जिंदगी’ म्हणत परिस्थिती ला स्वीकार केले. पण वेळेने ते करायला शिकवले. अश्या कडू, गोड, आंबट,.. आठवणींनी भरलेल्या ह्या वर्षाला राम राम करून आता नवीन वर्षाची सुरुवात करू या.

       मनुष्याचे जीवन म्हणजे तडजोड ही आलीच. पण तडजोड नसून तोड-जोड वाले जीवन आहे. समस्या, संबंध, शरीर.. हयामुळे मनाने कितीही तुटले तरी पुन्हा उभे राहणे म्हणजे खरे जीवन. शून्यातून सुरुवात करावी लागली तरी नव्या आशेने, उत्साहाने करणारा मनुष्यच आयुष्याच्या खेळा मध्ये विजयी होतो. खूप काही गमावून ही सर्व काही मिळवण्याची जिद्द ज्याच्या मध्ये आहे तोच यशस्वी होऊ शकतो. म्हणून ह्या नव्या वर्षाची सुरुवात आपण नव्या संकल्पानी करूया.

      तुम्हाला माहीत असेल गरुडाचे आयुष्य ७० ते ७२ वर्षाचे असते. या कालावधीत वयाच्या चाळीशी नंतर त्याची चोच दुबली होते. नख बोथट होतात, पंखावरची पिसे झडू लागतात. त्यामुळे गरुडाला वेगाने उडता येत नाही, भक्ष्य ही पकडता येत नाही. अश्या वेळी निरोगी जीवन जगण्यासाठी गरुडाला कठोर परिश्रम करावे लागतात. पाच महिन्याच्या अज्ञातवासात, निर्जन कडेकपाऱ्यात जाऊन राहावे लागते. ह्या दिवसांमध्ये तो आपली चोच कपारीवर आपटून त्रास सहन करतो. कालांतराने जुनी, दुबळी चोच गळून एक नवीन तीक्ष्ण, दणकट चोच फुटते. नव्या चोचीने बोथट झालेली नखं उपटून काढतो. या वेळीही त्याला असह्य वेदना होतात पण त्याही सहन करून काही दिवसातच टोकदार नखं उगवतात. या नखांचा उपयोग तो त्याच्या शरीरावरील जड पिसे उपटण्यासाठी करतो. आणि १५० दिवसांच्या खडतर कालावधी मध्ये असंख्य पीडा सहन करून गरुडाचा नवा जन्म होतो. नव्या दमाने, जोमाने, उत्साहाने तो पुढील आयुष्य जगतो. आपल्या सर्वांच्या जीवनामध्ये सुद्धा असा कालावधी आला असेल पण जून सर्व विसरून पुन्हा नव्या उम्मीदेने निरोगी, आशावादी, सकारात्मक दृष्टिकोणाने नव्या वर्षाचे स्वागत करूया.

               ‘जीवन गाणे गातच राहावे, झाले गेले विसरूनी जावे,

                पुढे पुढे चालावे, जीवन गाणे गातच राहावे

जे झाले त्याची खंत करत न बसता, जे शिल्लक राहिले त्याची वाह वाह करत भूतकाळाचा निरोप घेऊया. आज जे आहे त्यात समाधानी राहून प्रत्येक क्षण जीवंत पणे जगू या. जीवंत पणे म्हणण्या पाठी मागे हा उद्देश आहे की प्रत्येक क्षणाचा आनंद घेऊ या. वर्तमान श्रेष्ठ असेल तर भविष्य नक्कीच चांगले होईल. म्हणून ज्या चुका अजाणते पणी आपल्याकडून झाल्या त्याची पुनरावृती न व्हावी ह्याची काळजी जर घेतली तर नक्कीच मन सदैव आनंदी राहू शकेल. मनाची ओढाताण कमी होईल व भविष्याची सुंदर स्वप्ने साकारायला शक्ति ही मिळत राहील. फक्त वर्तमानात जगण्याची सवय स्वतःला लावून घ्यावी. त्यासाठी रोज मनाला  सकारात्मक विचारांची ऊब द्यावी. श्रेष्ठ विचारांनी स्वतःला भरपूर करावे. जसे घराबाहेर पडताना आपण आपले पाकीट बरोबर आहे की नाही, त्यात पुरेसे पैसे आहेत की नाही ह्याची तपासणी करतो तसेच रोज आपले मन श्रेष्ठ विचारांच्या पुंजी नी भरलेले आहे की नाही ते ही चेक करावे. शक्तिशाली विचारांचे धन जर बरोबर असेल तर कितीही कठीण परिस्थिती आली तरी त्यावर मात करू शकतो. मनाला काही नियमांचे बांध घालून चांगले प्रशिक्षित केले तर आयुष्यातले सर्व उतार- चढाव सुखरूप पार पाडू शकतो.

       चला तर, नवीन वर्षाच्या ह्या प्रथम दिवशी स्वतःशीच प्रतिज्ञाबंध होऊ या. १)कोणतेही दृश्य सामोरी आले तरी न डगमगता खंबीर होऊन प्रत्येक परिस्थितीला मी पार करेन.

२)प्रत्येक वेळी सकारात्मक राहून आयुष्याचा एक एक क्षण अविस्मरणीय बनावा असे मी स्वतःला बनवेन.

३)माझी आणि माझ्या कुटुंबाची जवाबदारी नीट पार पाडेन आणि त्यासाठी स्वतःला निमित्त समजून निश्चिंत होऊन पूर्ण करेन.

४) ईश्वराने जे काही दिले त्याचे मनापासून आभार व्यक्त करून, जे आहे त्याला बेस्ट बनवण्याचा मी नेहमीच प्रयत्न करेन.

अश्या प्रकारे आयुष्याची नवीन सुरुवात करूया. नव्या संकल्पनेने नवे विश्व निर्माण करू या. ब्रहमाकुमारी संस्थे तर्फे सर्वांना नवीन वर्षाच्या खूप खूप शुभेच्छा.

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Comfort Zone

प्रत्येक व्यक्तीला आपल्या जीवनामध्ये व्यक्ती, स्थान, साधन, वातावरण,….मिळाले आहे. आयुष्याची बांधणी त्या अनुसार करत आपण सर्व पुढे चालत आहोत. मनासारखे सर्व काही मिळेल अस नाही, पण जे लाभले त्यामध्ये सुद्धा जे आवडले, त्या प्रमाणे स्वतःला घडवत असतानाच कधी कधी आपल्याला मनाविरुद्ध बाहेर पडावे लागते. जसे काहींची नोकरीच अशी असते कि त्यांना काही वर्षांनी स्थानांतरण करावे लागते. पण जिथे राहिलो त्या घराबरोबर,शेजाऱ्यांबरोबर किवा तिकडच्या वातावरणा अनुसार राहण्याचा सराव करत असतानाच पुन्हा नवीन ठिकाणी जावे लागणार हा विचार मनाला अस्वस्थ करतो. प्रत्येक वेळी स्वतःला बदलत रहावे लागते, कित्येकदा मनुष्य हताश ही  होतो कि पुन्हा नव्याने सर्व काही करावे लागणार. पण जीवन म्हणजे परिवर्तन.
जीवनाच्या प्रवासाला निरखून पहिले तर वेळ, वय ह्या अनुसार आपण बदलतच असतो. हा बदल मान्य असतो. पण व्यक्ती, स्थान, नोकरी, साधन ह्यांना वारंवार बदलावे लागले तर ते नेहमीच स्वीकार्य नसते.त्या सर्वांशी झालेला लगाव आपल्याला दुःखी करून सोडतो. जसे एखाद्या व्यक्ती बरोबर आपले घनिष्ट संबंध जोडले गेले असतील तर त्या पासून दूर होणे हा विचारच आपल्याला कष्ट देतो. व्यक्ती, घर हेच काय पण रोज एका ठिकाणी बसून TV बघत असाल किवा झोपत असाल, ह्याहून ही अधिक जर आपला ग्लास, पेन, चमचा.. ह्या गोष्टी ही मनाला बांधून ठेवतात. त्या वस्तू कधी दुसरा कोणी वापरत आहे असे दिसून आले तरी मनाला कससच होते. होय कि नाही? म्हणजेच तुम्ही स्वतः ला त्या जागेशी एकरूप केल होत.त्या जागेबद्दल प्रेम, त्यापासून मिळणारा आराम ह्यांना स्वतः शी जोडल होत. थोड्या वेळासाठी त्या ठिकाणाशी तुटलेलं नात हे मनाला स्वीकार होत नाही कारण त्या स्थानाने जो आराम दिला होता तो मनाला सुखद अनुभवत होता. ते सुख न मिळाल्याने मनामध्ये चलबिचल सुरु होते. खाण्या-पिण्यामध्ये हाच brand हवा , हीच आणि अशीच वस्तू हवी ती नाही मिळाली तर काहीतरी चुकल्यासारखे किवा त्याची उणीव जाणवत राहते. अश्या अनेक गोष्टींची सवय आपण लावून घेतली आहे. त्यातून बाहेर पडणे कठीण. कारण ते आपले ‘comfort zone’ आहे. व्यक्तीने त्या अनुरूप स्वतः ला घडवले आहे. त्यातून बाहेर पडणे म्हणजे एक नवीन तडजोड.
पण खरतर ह्या comfort zone मध्ये मनुष्य कुठेतरी आपला विकास थांबवतो; जसे एखादे तलाव. पाणी साचलेले असते, पाण्याची पातळी तेव्हा वाढते जेव्हा पाऊस पडतो. बाकीच्या वेळी त्या पाण्याचा स्तर तेवढाच राहतो. तसेच मनुष्य एखाद्या विशिष्ट वातावरणात राहणे पसंद करतो. मग त्याची प्रगती फक्त त्या अनुसारच होते. पण त्यातून बाहेर पडून स्वतः च्या गुणांना, कलांना सिद्ध करण्याची वेळ येते तेव्हा व्यक्ती खऱ्या अर्थाने स्वतः ला ओळखतो. त्यावेळी त्याला आपली क्षमता, उणीवा, गुण ह्यांची समज मिळते. म्हणून एकाच वातावरणा मध्ये राहण्याची सवय न लावता, कोणत्याही व्यक्ती, स्थान, परिस्थिती मध्ये राहू शकू असे स्वतः ला घडवावे. जे पाश आपण स्वतः ला घातले आहेत ते आपल्या प्रगतीला ही बाधक आहेत. उन्नतीच्या शिडीवर चढायचे असेल तर अशी गोड बंधने तोडून बाहेर पडा. जसे एखादे पिल्लू घरट्या मध्ये आहे, सुरक्षित आहे. पण उंच भरारी घ्यायची असेल तर त्याला ही आपल्या पंखांना फडफडावे लागते. घरट्या बाहेरचे जग बघण्यासाठी प्रयंत्न करावा लागतो. कारण काही कमावण्यासाठी काही गमवावे लागते. आपण ही तशी तयारी ठेऊ या. नाहीतर हा comfort zone आपल्या विकासाच्या मार्गातील खूप मोठा अडथळा होऊन जाईल. स्वतः चे परीक्षण करा व असे अडथळे दूर करा.

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खरे सुख

आधुनिकतेच्या प्रवाहात वाहत जाणारा आजचा मनुष्य जसे वस्तूंना वारंवार बदलतो तसेच व्यक्तींना ,नात्यांना बदलण्याची सवय हि स्वतःला लावून घेत आहे. एकाच व्यक्ती मध्ये सर्व गुण न मिळाल्यामुळे व्यक्तींना हि बदलत चालला आहे. कदाचित त्यातच त्याला सुख मिळत आहे. खरच ह्यात सुख मिळते का? कि तात्पुरता आपली गरज सरावी हा त्यापाठी मागचा उद्देश असतो? नक्की काय हवय हेच आपण स्वतः ओळखू न शकल्याने किवा पारख नसल्या कारणाने अश्या गोष्टी आपल्याकडून घडत राहतात.
मनाचे वर्णन करताना काहींनी मनाला घोडा, वारा ,माकड…. अश्या अनेक उपमा दिल्या आहेत. आज आपले मन एका वानरासारखे ह्या व्यक्तीकडून त्या व्यक्तीकडे किवा एका पदार्थापासून दुसऱ्या पदार्थाकडे नजर फिरवत आहे. आपण बघितले असेल माकडाला कितीही केळी दिली तरी तो खाऊ शकतो. हातामध्ये पकडून तोंडामध्ये सुद्धा साठा करण्याची लोभवृत्ती त्यामध्ये दिसून येते. म्हन्जेच्म्जे मिळाले त्यात समाधान नाही. आणखी हवे हा ह्व्यास असतो. आज मनुष्याची गती ह्यापेक्षा वेगळी नाही. किती हवे आणि कुठपर्यंत हवे ह्याचे कोणते ही मापदंड नाही. तात्पुरते समाधान मिळते पण त्यानंतर परत एक नवीन इच्छा निर्माण होते. हे चक्र न संपणारे आहे. ह्या जीवनामध्ये ते सुख-समाधान मिळेल कि आयुष्यभर ही मृगतृष्णा अशीच राहील हा प्रश्न सर्वांचाच मनात आहे.
इंद्रीयांपासून मिळणारे सुख अल्पकालीन असल्यामुळे त्याची भूक नेहमीच राहते. जसे लहानपणापासून आपण खात आलो. कोणी आपल्याला विचारले कि आणखीन किती वर्षे खात राहणार? तर त्याचे उत्तर कोणीच देऊ शकत नाही. कारण जो पर्यंत शरीर आहे तो पर्यत त्याचे संगोपन करावेच लागणार. म्हणून हा प्रश्नंच चुकीचा आहे. परंतु आज प्रत्येक इंद्रीयांपासून मिळणारे सुख हवेहवेसे वाटते.डोळ्यांनी बघण्याचे सुख मिळते. कोणी सिनेमा, painting, निसर्गाचे रूप… बघून ते सुख मिळवतो. कानाद्वारे कोणी संगीत, भजन, प्रवचन , रेदिओ वरच्या बातम्या ऐकून सुख घेतो. अश्याप्रकारे खाण्याचे,खरेदीचे , फिरण्याचे, कपड्याचे… अनेक नश्वर वस्तू-पदार्थापासून सुख घेण्याचा प्रयत्न करत राहतो. पण जर आपल्याला ह्याची सवय जडली व काही कारणास्तव ते मिळणे बंद झाले तर मनुष्य बेचैन होतो. जसे व्यसनीचे पाय नकळत मधुशालेकडे वळतात.तसेच आपले मन हि पुन्हा पुन्हा त्या व्यक्ती, वस्तू, पदार्थाकडे जाते. मन ह्या इंद्रियांच्या सुखाचा व्यसनी होऊन जातो. म्हणून मनाला नक्की कोणते सुख मिळायला हवे हे समजण्याची आवश्यकता आहे.
जसे लहान मुल रोज चोकलेट, आयस्क्रीम , कुरकुरे.. ची demand करत असेल तर त्यांना नकार दिला जातो. कारण पालकांना माहित आहे की रोज हे खाल्याने तब्येत खराब होऊ शकते. मग मुल कितीही रडले तरी त्याला आपण ते देत नाहीत. तसेच मन जर एकसारखे चुकीच्या वस्तूची demand करत असेल तर त्याला ही आपल्याला थांबवता आले पाहिजे. एखाद्या व्यक्तीकडे पैशाची टंचाई असेल व तो कोणाकडे मदत मागायला गेला. समोरच्या व्यक्तीने मदत न करता अपमान केला तर आपण बोलतो की भले मदत नका करू पण गोड शब्द तर बोला. चांगली वागणूक तर द्या. म्हणजेच पैसा हि गरज असली तरी मनाचे समाधान चांगल्या व्यवहाराने हि होते. व्यक्ती दुखी झाल्यावर ईश्वराच्या दारी जातो. माहित आहे कि व्यक्तींनी पाठ फिरवली तरी ईश्वर नक्कीच मदत करेल. ईश्वराची कृपा व्हावी म्हणून व्रत, उपवास… करतो.परंतु त्यापेक्षा जर मानाने त्याची खरी भक्ती केली तर मन शांत होते. मनाची ओढ ईश्वराकडे जर असेल तर फक्त शांत नाही पण आपण शक्तिशाली झाल्याचा अनुभव करतो.
व्यक्तीचे सान्निध्य काही वेळेसाठी मिळू शकते पण ईश्वराचे सान्निध्य जितके हवे तितके मिळू शकते. ईश्वराची सोबत मनुष्याला चांगल्या मार्गावर घेऊन जाते. चांगले विचार करण्याची बुद्धी देते. हे चांगले विचार मनाला सुखद अनुभव करून देतात. जसे विचारांनी दुखी होतो तसेच विचारांनीच खऱ्या सुखाचा आस्वाद घेऊ शकतो. हा सहवास आपण सुरक्षित असल्याचे समाधान देते. म्हणून कार्य व्यवहार करताना थोडा वेळ ह्या सहवासासाठी काढावा. जसे मोबाईल ची battery low झाली तर आपण त्याला वारंवार charge करतो तसेच ईश्वराचे सान्निध्य आपल्यामध्ये नवी चेतना जागृत करते. प्रगतीच्या मार्गावर चालण्याचे बळ देते. म्हणून विचारांद्वारे त्या ईश्वरासोबत राहून बघा. हे सान्निध्य खऱ्या सुखाचा अनुभव देईल. आणि असे अनुभव अपेक्षे पलीकडचे असतील. हे नक्की करून पहा.

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दिपावली मनाए नई सोच के साथ

भारत ही एक ऐसा देश है जहा त्योहारो की शृंखला चलती है| गणेशोत्सव, नवरात्रि उत्सव और फिर दिपावली लेकिन दिपावली का महत्व कुछ और है| जिसका इंतजार बच्चे-बुढे सबको रहता है| कई दिनो पहले से सब उसकी तयारी मे लग जाते है| सफाई, नये वस्त्र, नई चीजे, मिठाईया .. हर घर मे दिये जलाकर रोशनी की जाती है| पुरा माहोल उमंग, उत्साह से भर जाता है| वर्तमान समय हम जिस दौर से गुजर रहे है उसमे कुछ सावधानिया बरतनी पड रही है लेकिन फिर भी हम दिपावली का त्योहार मास्क पहनकर, दुरिया बनाकर भी मना रहे है|

जैसे आज मास्क, सोशल distancing, sanitase करना जरूरी है वैसे आज दिपावली हम नये अंदाज के साथ मनाये| त्योहारो मे नये कपडे पहनते है उसी तरह नये तरीको को अपनाकर चले| korona के कारण मुह पर मास्क लगाना अनिवार्य है| कईयो ने उस मास्क को भी fashion का रूप दे दिया है| जैसा ड्रेस वैसा मास्क| क्या हम जैसा समय वैसी सोच बनाकर चल सकते है? क्या कम बोलकर समस्या को कम कर सकते है? मुह पर पट्टी बांध लेना माना व्यर्थ, नकारात्मक बोल को पट्टी लगाना| कहते है ‘चूप रहने मे सों गुण’| इसलिए समय भी हमे चूप रहना सिखा रहा है| आज हम सभी को ‘ Happy New Year ’ का massege भेज रहे है, शुभ कामनाए दे रहे है लेकिन साथ साथ नई सोच भी रखे| दिपावली माना पुराना खाता खत्म और नया शुरू | हम व्यवहार मे भी इस बात को लाये| पुरानी यादे, बाते, गलत अनुभव ऊनको delete करते जाये| आज तक जो react करने का तरीका रहा उनको आज से बदल दे| तभी कह सकते है नया साल| पुरानी बातो को लेकर नया साल कैसे मना सकते है?

दुसरी बात social distancing रखते है जिससे सामनेवाली की सेहत का हमपर असर ना हो, वातावरण मे फैले हुए gems हावी ना हो| आज कोई रुठ जाता है, नाराज होता है, गुस्सा करता है तो उसका असर जरूर हमपर होता है और हम भी वैसे ही करने लग जाते है| या कोई हसकार बात करे हो हम वैसे कर लेते है| अर्थात परिस्थिती का प्रभाव पडता है| उस प्रभाव से बचने के लिए हम ‘थोडीसी दूरी है जरूरी’ इसको समझे| विचारो की भिन्नता होते हुए भी सबको अपना कर चलना| आज बार बार हाथ धोने के लिए इशारा दिया जा रहा है, हम अपने मन पर लगने वाले कुविचारो के मैल को भी बार बार धोते रहे जिससे हमारी मानसिकता अच्छी रहे| शरीर की immune को बढाने से सदा सेफ रह सकते है वैसे ही हम अपनी मन की immune को बढाने के लिए रोज शुद्ध विचाऱ्ओंका सेवन करे| आज हम नये साल की शुरुवात नई सोच के साथ करे| रोज सुबह एक समर्थ, सकारात्मक सोच को मन मे लाये और पुरा दिन उस विचार को दोहराये| आप अनुभव करेंगे की सोच से हमारी कार्य प्रणाली भी फास्ट हो जाती है | इससे हमारा तन और मन दोनो सुरक्षित रह सकते है|

तो आईए, समय के परिवर्तन के साथ अपनी सोच को बदलकर जीवन को नये अंदाज के साथ जीकर देखे| नई सोच, नया तरीका ही जीवन मे उमंग भर देता है| और “जहा उत्साह है वहा उत्सव है”| नाही तो उत्सव होते हुए भी दुखी हो जाएंगे| चलो इस बार हम दिपावली का त्योहार कुछ स्थूल सावधानीयो  को ध्यान पे रखते हुएमन को शक्तिशाली बनाकर मनाए|

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