स्मृति – मंजुषा

आधुनिक जगत मे सब से प्रभावी और आकर्षित करने का साधन मोबाइल है, जिस मे हम रोज के messages , images, videos store करते है | इसके लिए हम अलग से memory card भी use करते है | कई बार जब वह full हो जाती है तो बार-बार हमे notification आता है कि आप अपने storage को खाली करे | हम इन सभी बातों के अनुभवी है |

 

मनुष्य जीवन भी ऐसा ही है | इस जीवन मे हमने कई अच्छे-बुरे, मीठे-तीखे अनुभव किये है | जाने अनजाने मे हमसे वह सारे store हुए है | जब कभी अकेले मे बैठते है तो वह सारी बाते मानसपटल पर आ जाती है | जैसी स्मृतिया होगी वैसी स्थिति बनती है | ख़ुशी की सुखभरी बातों को याद करो तो चेहरा खिल उठता है और वही अगर दुःख-दर्द की बाते हो तो चहरे पर उदासी छा जाती है |

 

पुराने ज़माने मे लोक अपना सामान पेटीयों (अटैची ) मे रखा करते थे | पेटी ये शब्द अलग-अलग तरीके से इस्तमाल किया जाता है | दानपेटी, कचरापेटी  …………. जिसमे हम कई चीजे डालते है | जब भर जाती है तो खाली करते है | जैसे दानपेटी रोज खाली नही करते | मास मे एक या दो बार हम उसे खाली करते है मगर कचरापेटी जिसे रोज खाली करना पड़ता है क्योंकि उस में waste चीजे डाली जाती है | अगर वह रोज खाली करो तो मच्छर, मक्खी, कॉकरोच। ……  जैसे जीव पैदा होते है जो अनेक बीमारीयों का कारण बनते है |  दानपेटी मे डाली हुई चीजे मूल्यवान होती है इसलिए उसे रोज खाली नही करते |  वास्तव मे देखा जाए तो हमारा मन यह भी स्मृतियों की पेटी है जिसे ही स्मृति मंजूषा कहा गया है | अपने इस जीवनकाल मे जो भी हमने अनुभव किया है उसका संग्रह रोज होता जाता है | अगर हमारी स्मृतियों मे वैर-विरोध, दुःख-दर्द की बाते हो तो इसे रोज खाली करे क्योंकि जितना इसका संचय होगा उतनी ही मानसिक बीमारीयाँ बढ़ेगी |  जैसे मच्छर काटते है तो दर्द होता है ऐसे ही ये स्मृतियाँ भी हमे बार-बार काटती है | इस से फिलिंग का फ्लू होने के आसार नजर आएंगे |

 

वर्तमान समय मनुष्य की मानसिकता को टटोले तो उसमे अतित की बाते या फिर भविष्य की चिंता ज्यादा नजर आती है | बहुत ध्यान से हम इस मंजूषा में स्मृतियों का संग्रह करे |  कहते है ‘ धन से आप बिस्तर खरेदी कर सकते हो, नींद नही, धन से आप साधन खरेदी कर सकते हो, सुख नहीं ………’  कहने का भाव यह है कि सुख-चैन ……… यह हमारी मन की अवस्था है जो हमारी सोच और स्मृतियों पर आधारित  है |

 

स्मृतियों का आधार सिर्फ अभी का जीवन नही परंतु गत जन्म की बाते भी हो सकती है |  past life regression में कईयो ने अपनी मृत्यु की घटना अपने संबंध……..कई बातों को बताया है | अपरोक्ष रूप मे उन सभी का हमारी स्मृतियों पर असर पड़ता है | क्यू किसी को देखने के बाद हमे ऐसे लगता है कि हम पहले भी कभी मिले है या फिर इनको पहले मैने कही देखा है ? किसी स्थान पर जाते ही ऐसा महसूस होता है कि हम पहले भी यहाँ कभी तो आए है ….  किसी व्यक्ति, स्थान, घटना  ……… को देखने के बाद अतित की वो स्मृतियां जागृत हो जाती है |  hypnosis  ( संमोहन प्रक्रिया ) मे मनोवैज्ञानिक उन स्मृतियों को जागृत करते है |

 

past life Regression, Hypnosis  ………  की प्रक्रियाए मनुष्य की उलझी हुई गुत्थियों को खोल देती है | इससे  हम कई मानसिक बीमारीयों से मुक्त हो जाते है | आतंरिक शक्तियों को जागृत करने का प्रभावी साधन भी है |  रामायण में हनुमानजी को पवनपुत्र कहते है | बचपन से ही उनके अंदर असीम शक्तियाँ थी जिसे कई बार रोकना एक बड़ी समस्या हुआ करती थी | इस शक्तिशाली बालक को उसी वजह से गुरुकुल मे प्रवेश देने से भी गुरु इतराते थे | एक बार माता अंजनी के विनंती से हनुमान जी को गुरुकुल मे प्रवेश मिलता है | छोटे शक्तिशाली और शरारती होने के कारण कई बार अपने साथियों से अनबन भी होती थी |  एक बार शरारत के कारण गुरु से उनको punishment मिलती है जिस मे उनको  सभी को भोजन गरम करके खिलाना था | हनुमानजी के एक फूँक से आग जला करती थी परंतु उस दिन कई बार फूँक मारने पर भी आग न जलने के कारण सारे साथी बालक हँसने लगे, मजाक उड़ाने लगे | इस बात को देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हो जाते है और जोर से फूँक मारते है | देखते ही देखते सारे आश्रम को आग लग जाती है, कुछ बच्चे भी इसके चपेट मे आ जाते है | आश्रम का वातावरण बिल्कुल हलचल शोरगुल वाला बनता है | गुरु जब इन बातों को देखते है तब क्रोधित होकर हनुमान जी को  श्रापित करते है कि आज के बाद तुम कभी अपनी शक्तियों का इस्तमाल नही कर पाओगे जब तक कोई तुम्हे याद न दिलाए | इस श्राप से मुक्त करने के लिए माता अंजनी गुरूजी से माफ़ी और मुक्ती की याचना करते है | गुरु कहते है ‘ जब श्रीराम इनके जीवन मे आएंगे , वो इनको याद दिलाएंगे तब इनकी यह शक्तियां जागृत हो जाएगी ’ |  कुछ अरसे के बाद श्रीराम जी हनुमानजी  के जीवन मे आते है, उनकी स्मृतियों को जागृत करते है तब वह श्रापमुक्त होते है |  शक्तियों को जागृत करने के लिए श्रेष्ठ संकल्पों का चिंतन अतिआवश्यक है |

 

श्रेष्ठ चिंतन, प्रभु चिंतन भी सकारात्मक स्मृतियों का निर्माण करता है |  मनुष्य जीवन प्रभु सौगात है , अनमोल भेट है इसे मूल्यवान बनना  है तो रोज नए सुंदर विचारों का निर्माण करे | दिनभर मे अच्छी-बुरी कितनी भी बाते आए परंतु अच्छी बातों को संजोकर रखे | बार-बार उन्हे याद कर अच्छी महसूसता ( good feeling ) मे जीने का नियम बनाए |  आप देखेंगे, जीवन मे किसी मोड़ पर अतित की और झाँकना भी पड़े तो इस स्मृति मंजूषा से सुखद, आनंददायी बाते ही मानस पटल पर दिखाई देगी |  जीवन की हर झलकियों को देखकर मन प्रफुल्लित तो उठेगा |

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क्यू का जाल

आज का मनुष्य समय के साथ कदम मिलाकर चलने का प्रयास कर रहा है |  परंतु काम का pressure, बढ़ती समस्याएं, जिम्मेवारीयाँ और उसके साथ बढ़नेवाला तनाव, इस अपने ही बुने हुए जाल में मकड़ी जैसे फॅसा हुआ है | एक वक्त था मनुष्य थोड़े पैसो में अपने पुरे परिवार को संभालता था परंतु आज लाखो कमाने के बाद भी इच्छाएं पूरी नहीं कर पा रहा | जीवन में थोडीसी भी कमी महसूस हो तो तुरंत सवाल उठता है मेरे साथ ऐसा क्यू ?  इस क्यू की लंबी क्यू (कतार) लग जाती है | इस क्यू का जवाब ढूंढते-ढूंढते फिर इन्सान खुद ही तंग हो जाता है | क्या आप भी अपने से या किसी और से ये सवाल करते हो कि मेरे साथ ऐसा क्यू ?

 

अपने जीवन को थोड़ा रूककर देखे तो हमने बहुत कुछ पाया है, बहुत कुछ खोया भी है  लेकिन जब सुख के पलों में जी रहे होते है तब ये सवाल हमारे अंदर नहीं आता कि मुझे ही pramotion क्यू, मुझे ही सफलता क्यू मिली, ….

 

सुख को  आसानी से अपना से  अपना लेते है परंतु दुःख का स्वीकार करना मुश्किल लगता है |   परिवर्तन जीवन का नियम है | सुख-दुःख, लाभ-हानि, पाना-खोना…    यह  होना ही है | हम हसते-हसते हर एक दृश्य का स्वीकार करने की आदत डाले |  वरना प्रश्नों के जाल में फसते ही जाएंगे |

 

बचपन में जब छोटे बच्चे को पेन्सिल पकड़ना भी नहीं आता है तब भी वह बिन्दी लगता है अर्थात फुलस्टॉप की  मात्रा लगाता है |  लेकिन जैसे बच्चा बड़े होने लगता हैं तब सबसे कठिन लगनेवाली मात्रा प्रश्नचिन्ह (?) बार-बार लगाता हैं | स्कूल में पढ़ते वक्त यही मात्रा लगाने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी और आज वही बड़ी आसानी से लग जाती है | वास्तव में आप देखे तो हर मात्रा के नीचे आपको एक बिंदी नजर आएगी | आश्चर्य की मात्रा ( ! ), अर्ध विराम ( ; ), प्रश्नचिन्ह ( ? ) हर मात्रा हमें फुलस्टॉप लगाने के लिए कहती है | अर्थात जब हम सारे व्यर्थ विचारों को स्टॉप करेंगे तब नया मोड़ ले सकेंगे |  जीवन को नई दिशा दे सकेंगे |  परंतु मनुष्य का अपनी सोच पर काबू नहीं है | लगातार सोचता ही रहता है | उस सोच में अतित और भविष्य  के संबंध में बहुत सारे सवाल ही होते है लेकिन  जवाब कहाँ पर भी नहीं होता | वास्तव में सारे जवाब हमारे ही भीतर होते है | हर नकारात्मक विचार को स्टॉप करने का साधन है एक सकारात्मक विचार | कहते है ‘ कोई भी परिवर्तन आपके एक संकल्प की दुरी पर है | ’

 

‘ सब अच्छा है, सब ठीक है,’ जो हो रहा है वह अच्छा है, जो हो रहा है वह भी अच्छा और जो होगा वह तो सब से अच्छा ’…. ऐसे विचार करके हम अपने मन को शांत करे, हर सवालों के उत्तर एक दृढ़ और शक्तिशाली सोच से दे तथा विचारों के जाल से अपने को बचाए |

 

वर्तमान समय जितनी भी बीमारीयाँ भले वह शारिरीक हो या मानसिक हमारी नकारात्मक सोच का परिणाम है | शरीर का इलाज फिर भी होता है लेकिन मन का इलाज हमारे खुद के अलावा कोई नहीं कर सकता |  इसलिए रोज अपने से बात करने की आदत डाले, self counselling करे जिससे सारे सवालों की गुत्थी सुलझ जाएगी और जीवन सुखमय बन जाएगा |

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जैसा संग वैसा रंग

स्वाती नक्षत्र की बारिश की बूंदे सीप मे गिरे तो वह मोती बन जाती है, वही बूंदे पत्तेपर गिरे तो ओस बन जाती और वही अगर साँप के मुँह मे गिरे तो जहर बन जाती | बूंदे तो बारिश की ही है लेकिन जिसके संग मे आये उस अनुसार उसका महत्व बन जाता है | लोहे को पारस पत्थर का स्पर्श हो या संग मिले वह सोना बन जाता और पानी का संग मिले तो  जंक लग जाती | कहीं हमारा भी वैसे तो नही होता ? यह मनुष्य जीवन मूल्यवान है | इसके मूल्य को पहचाने |

 

आधुनिक जगत मे हमे विज्ञान ने बहुत सारे साधन दिए है जो हमे ढेर सारी खबर देता है | वो सुनने और देखने की रूचि कितनी रखनी है यह हमारी choice है | आज हर आयु का इन्सान mobile को देखने मे लगा हुआ है | वह तो एक साधन है उसमे अच्छी भी बाते मिलती है तो बुरी भी | कोई उसका इस्तमाल करके अपने ज्ञान के भण्डार को बढ़ाता है और कोई बुराइयों को |  हमे देखना है कि हम कौनसी बातों का संग रखना चाहते है | आज का युवा वर्ग गलत चीजो को  देखने मे अपनी राते बिगाड़ रहा है, अपनी मानसिकता को कमजोर कर रहा है | गलत सुनने, देखने से हमारी ही शक्तियों का -हास हो जाता है |  इसलिए सावधान होकर हम संग करे |

 

कलियुगी दुनिया मे रहते हुए भी हमारे इर्द-गिर्द अच्छी चीजे है जिसे आप देख, सुन और पढ़ सकते है |  जो संग आपने अपनाया है उसके रंग से आप अछूते नही रह सकते |  कहते है न कोयले में हाथ डालेंगे तो काले तो हो ही जायेंगे | गांधीजी कहा करते थे ‘ बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो ’| दत्तात्रय के बारे मे भी बताते है कि उन्होने हर एक प्राणी से गुण उठाए, विशेषताए देखी | देखना यह तो एक स्वाभाविक कर्म है लेकिन क्या देखते है यह हमारी मानसिकता है | हम अपने आपको सिखाए की ‘ मुझे अच्छा ही देखना, सुनना और बोलना है | अच्छाईयों का संग करे | अपनी रूचि को टटोले |

 

महाभारत मे दिखाया है कि कर्ण और अर्जुन एक ही माता कुंती के पुत्र थे | दोनों भी शूरवीर धनुर्धारी | अर्जुन से भी कर्ण अधिक शक्तिशाली माने जाते है परंतु संग, निश्चयबुद्धी ……. होने के कारण महाभारत के युद्ध मे अर्जुन की विजय दिखाई है | कर्ण की मैत्री दुर्योधन से हुई | वास्तव मे देखा जाए तो कर्ण के अंदर बहुत सी विशेषताए थी परंतु दुर्योधन के संग मे आकर कुछ बुराइयाँ भी प्रवेश कर गयी | दुर्योधन के उपकार के नीचे दबकर असत्य का साथ देना पड़ा | वही अर्जुन को देखे तो कुछ कमीयाँ होने के बावजूद श्रेष्ठ संग, निर्मल मन के कारण महाभारी युद्ध में भी विजय प्राप्त कर ली | कर्ण का दूसरा अर्थ है कान | कई बार हम सिर्फ सुनी-सुनाई बातोंपर विश्वास रखते है | जिसके कारण हमसे भूले होती है परंतु अर्जुन ने सिर्फ सुनने पर नही लेकिन देखने पर विश्वास रखा | श्रीकृष्ण ने जब विराट रूप दिखाया तब अर्जुन का विश्वास और बढ़ा | उसके बाद उन्होने श्रीकृष्ण की हर बात को माना | हम भी देखने और सुनने पर विश्वास रखे | अच्छी बाते सुनने से मन की धरती तयार हो जाती है और वह सुनी हुई स्थूल या सूक्ष्म नेत्रोंसे देखने से वैसी अनुभूतीयाँ होती है |

 

 

ध्यान रखे, हमे कर्मों से, मानसिकता से गिरना नही है और ना ही किसी को गिरना है | जैसे रास्ते पर कूडा-किचड़ा पड़ा हुआ होता है तो हम उसे देखना भी पसंद नही करते वैसे ही बुराईयाँ भी हमारे जीवनपथ मे रूकावट न बन जाए, उसे भी नजरअंदाज करके आगे बढ़ना है | ‘ कमी से मेरा कोई काम नही ’| इस बात पर डटकर रहना है | इस मार्ग मे अनेकानेक बाते, घटनाए आएगी लेकिन उन्हे बाजू कर आगे निकल जाना है |

 

स्थूल रूप मे देखने, सुनने पर तो ध्यान रखे ही परंतु सूक्ष्म रूप से भी alert रहे | हमारे मन मे भी बहुत से दृश्य, घटनाए है परंतु किन बातों को याद रखे या याद करे उसपर ध्यान रखे |  क्योंकि मनुष्य दरअसल अपने अंदर के विश्व मे ज्यादा रहता है | अपने अंतर्विश्व को बेहतर बनाए | जैसे खुशबूदार फूल मन को आकर्षित करते है, सुख देते है वैसे ही अच्छी बाते याद करने से भी हमे  सुख मिलता है | सुख मे रहना या दुःख मे रहना यह हमारी choice है |

 

सफ़ेद कपडे को जिस भी कलर के पानी मे डुबो दो उसपर वैसा रंग चढ़ जाता है ऐसे ही हमारे ऊपर भी वही रंग चढ़ता है जो रंग हम चढ़ाना चाहते है |

 

संग भी अनेक प्रकार के होते है | कोई अच्छी किताबों का संग करता, कोई गुरु का संग, कोई व्यसनों का संग कर लेता है |  आज कल तो mobile का संग ज्यादा दिखाई देता | दुनिया मे सत्संग का बड़ा महत्त्व है |  कोई गीता, भागवत, रामायण की कथा सुनने के लिए अपना समय निकालते है, चाहे तो वह अपना समय किसी और अन्य जगह लगा सकते है परंतु सत संग मे जाकर अच्छी बातों को सुनने की रूचि रखते है | अच्छा संग मनुष्य को अच्छाई के पथ पर ले जाता और बुरा संग बुराई की तरफ इसलिए कहावत है ‘ सत का संग तारे, कुसंग डुबोए ’|

 

मन परमात्मा की याद मे भावविभोर हो जाए तो उसे शांति और शक्ती एहसास होता है जैसे इस दुनिया से detach हो जाता है | भीड़ मे भी, आवाज मे भी वह अलौकिक सुख का अनुभव करता है | हमे उस सर्वोच्च परमात्मा का संग करना है, उनकी दिव्य शिक्षाओं का संग करना है जो हमे बिकट परिस्थितीयों को पार करने में साथ देता है | उसका साथ शक्तिशाली बना देता है | ऐसे परमात्मा का संग करके, उसके गुणों के रंग मे खुद को रंग दे |

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संघर्ष

 

दुनिया में कई फिलोसोफर्स ने जीवन की कई परिभाषाए बताई है | ‘Life is a journey, Life is a Game’ ….. कईयों ने जीवन को संग्राम भी कहा है | इस जीवन मे हम सभी भी अनुभव करते है कि यह एक युद्ध का मैदान बन गया है जहाँ हमारा कइयों के साथ संघर्ष है |

 

स्कूल लाइफ मे हमने सुना है कि दो धातुओं का घर्षण या झाड़ की दो टालीयों का भी घर्षण होता है तो आग या चिंगारी जलती है | वैसे ही दो मनुष्यों के भिन्न विचार भी जब एक-दूसरे से टकराते है तो वहाँ संघर्ष पैदा होता है | वर्तमान समय मन की कमजोरी के सहन करना, सामना ………  यह सारी शक्तियों का ऱ्हास होते हुए देख रहे है | संघर्ष होने की बाते वास्तव मे बहुत छोटी होती है परंतु एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की चेष्टा तक कोई कर नही पाता |  हर कोई यही सोचता है कि ‘ मै राइट हु, सामनेवाला गलत है ’ लेकिन रूककर हम अपने को तथा अन्य को भी समझे तो वास्तव मे दोनो भी अपनी जगह राइट ही है | संकुचित विचारधारा मनुष्य को दुःखी बना देती है |  दो टालियाँ या दो वृक्ष आपस मे टकराते है तो जंगल को भी आग लग जाती है वैसे ही दो मनुष्यों के भिन्न विचार टकराए तो घर भी युद्ध का मैदान बन जाता है | सभी पर उस वातावरण का असर होता है |

 

सुखी जीवन बनाने के लिए, संघर्ष को खत्म करने के लिए एक छोटासा परिवर्तन लाना है | इस संघर्ष शब्द को थोड़ा अलग ढंग से पढ़कर देखे ‘संग + हर्ष ’ इस जीवन मे हमे जो भी मिले है वह किसी जन्म के कोई संबंध है जिसके कारण मिले है | वह वही हमे लौटा रहे है जो हमने उनको दिया है | हर परिस्थिती के पीछे उसका कुछ कारण है, उसको समझने की जरुरत है | दुनिया मे एक कविता पढ़ी थी जिसका शीर्षक था ‘ कुछ तो कारण होगा ’ | लेकिन जब संघर्ष का समय होता है हम उस कारण को जानने की तो इच्छा रखते है मगर समझने की नहीं |

 

हर मनुष्य के जीवन मे किसी न किसी घटना को या व्यक्ति को लेकर ‘ मेरे साथ ऐसा क्यू ’ ये सवाल उठता है | उस क्यू की लंबी कतार बन जाती है और हम जवाब के लिए हमेशा भटकते हुए नजर आते है | संघर्ष = संग + हर्ष के equation को समझ ले | हर व्यक्ती के साथ हमारे सुख, दुःख के बंधन बंध चुके है | हम सभी अनुभव भी करते है कि जिस व्यक्ति से हमे प्यार मिला, वही शक्स हमारे दुःखों का कारण बनता है | उन दिनो मे उनके साथ बिताए हुए अच्छे पल याद भी नहीं आते | इनके बारे मे अच्छा सोचे जैसे हमारे लिए मुमकीन हो जाता है | लेकिन उसी समय हमे अपने को सकारात्मक बनाने की जरुरत है | जैसे बुखार आता है तो हम तुरंत दवाई ले लेते है वैसे ही जब किसी के प्रति नफरत आ जाए तभी उसके लिए अच्छी सोच रखकर अपने मन को कमजोर होने से बुरा होने से बचाए | क्यों कि काँच का कोई भी बर्तन या शिशा एक बार टूट जाए, हम उसे किसी सोल्यूशन से चिपकाए भी मगर उसकी वो दरार दिखाई देती है उसे मिटाना असंम्भव हो जाता वैसे ही टुटा हुआ दिल, बिगड़ी हुई भावनाए भी शिशे की तरह है | उन्हे टूटने न दे |

 

हम जिनके साथ रहते है, सम्पर्क मे आते है, हर किसी के व्यवहार को देखे, समझे फिर प्रत्यूत्तर दे | अगर कोई कड़वाहट नजर आए तो खुद भी कड़वे न बने बल्कि उस समय मौन हो जाए | अपने और दूसरे को थोडासा परिवर्तन होने के लिए सहयोग दे | जीवन के कुछ लम्हे हमारे पास है, उसे ख़ुशी – ख़ुशी बिताने का लक्ष रखे | हर एक के संग हर परिस्थिती मे हर्षित रहने का नियम बनाए | बुराई मे भी अच्छाई को ढूंढने की आदत डालो | इसी आदत से मेरा तथा सभी का भला होगा | व्यर्थ सोचने, बोलने, सुनने तथा शक्तियों ऱ्हास होने से बच जाएंगे |

 

हर परिस्थिती मे हर्षित रहने के लिए अच्छी सोच जरुरी है क्योंकि वह हमारे तन और मन दोनो पर असर करती है |  कहते है खुश रहने से आधी बिमारी दूर हो जाती है | किसी और के लिए नही परंतु स्वयं के लिए खुश रहो | आपने देखा होगा कोई डान्स करता है तो जो उदास है वह भी थोडासा क्यू नही लेकिन झूमता जरूर है | ऐसे ही हमारी खुश रहने की आदत औरों के दिलो को भी हर्षाएगी |

 

दूसरी बात, कोई मुझे कुछ भी दे लेकिन मुझे औरों को ख़ुशी देनी है | कोई कैसा भी हो लेकिन मुझे उनको अच्छा देना है, यह सोच भी आपसी संघर्ष को ख़त्म कर देंगे | क्योंकि हमे औरों को क्या देना है यह हमारी अपनी choice है या सबके संग हर्षित रहना है, खुश रहना है इसका निर्णय तो हम ही ले सकते है |

 

परिवर्तन जीवन का नियम है |  परिवर्तन के लिए तयार रहे या धैर्य धरे | हर एक व्यक्ती, वस्तु, प्रकृती से जुडी हर एक बात को परिवर्तन होना ही है | जो आज है, वो कल नही होगा, सब कुछ बदल जाएगा |

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क्षमा वीरस्य भूषणम

जीवन एक सफ़र हैं| इस सफ़र की कई अच्छी-बुरी यादे हमने इस मन में संजोए रखीं हैं| जब कभी अकेले हो जाते है तो वह यादे ताजा हो जाती हैं| आधुनिक जगत की सबसे प्यारी चीज जो आज सब अपनी जेब में लेकर चलतें हैं, वो है mobile. कई photos, videos हम उसमें store करते हैं| उनके द्वारा कई बीते हुए लम्हे याद करतें रहते है| सुखद बातों को याद करो तो मन खुश हो जाता है परंतु वही अगर दु:ख की घटनाए याद आ जाए तो कभी-कभी बदले की भावनाए भी जाग उठती है|
जीवन में सुख-दु:ख को धूप-छाव की तरह बदलते हमने देखा हैं| परंतु यदि किसी के लिए नफरत या बदले की भावना हो तो हम उसे रुककर मिटा दे क्योंकि वो भावना किसी और को नहीं लेकिन खुद को ही कांटे की तरह चुभती हैं| भल किसी ने दर्द दिया हो, नुकसान किया हो या फिर फ़साया हो…… जीवन एक छोटासा सीन समझकर उसे भूलाने की कोशिश करे| कहा जाता है ‘माफ़ी माँगना बड़ी बात नहीं परंतु माफ़ करना सबसे बड़ी कला है’ इसलिए कहते ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’| गाली देनेवाले को गले लगाना – यह महानता के लक्षण हैं, जो हर किसी में नहीं पाए जाते| इस गुण के कारण ही कई लोग महात्मा बने| भले के साथ भला और बुरे के साथ बुरा यह तो हर कोई करता है लेकिन बुरे का भी भला हो यह भावना बहुत कम लोगों में पायी जाती हैं| मोहम्मद साहेब उनके जीवन का किस्सा याद आता है| मोहम्मद साहेब नमाज़ के लिए रोज मस्जिद में जाते थे| जिस रास्ते से गुजरते थे उसी रास्ते में एक वृद्धा का घर लगता था| जैसे ही वो वृद्धा उन्हें आते देखती थी वो अपने घर का कचरा उनपर फेकती थी| मोहम्मदजी कुछ न बोल उस कचरे को झटककर आगे बढ़ते थे| एक-दो दिन नहीं परंतु ये रोजाना होता था| फिर भी मोहम्मद साहेब उस वृद्ध महिला के प्रति सद्भावना रख उसे माफ़ करते थे| एक दिन वो हमेशा की तरह उसके घर के सामने से गुजरे तो क्या आश्चर्य? न वो महिला दिखाई दी, न कचरा डाला गया| उन्हें थोड़ा सा अचरच तो हुआ मगर वो ज्यादा न सोच आगे बढे| दो-तीन दिन लगातार उन्हें वो वृद्ध महिला नजर न आयी फिर उन्होंने सोचा चलो जाकर देखें तो सही वो कहाँ है? दरवाजे को खटखटाया, वो महिला बड़े कष्ट से दरवाजा खोल पायी| उन्होंने देखा तो बिचारी बुखार में तड़प रही थी| तुरन्त वैद्य को लेकर आए और उसका इलाज़ करवाया| कुछ ही दिनों में उनकी सेवा-शुश्रूषा से वह बिल्कुल ठीक हो गयी| ठीक होने पर भी मोहम्मदजी ने उसे कहा ‘और कोई सहायता लगे तो जरुर याद करना’| ये शब्द सुनते ही उस वृद्धा की आखें भर आयी| आत्मग्लानी का एहसास उसे हुआ और वह माफी माँगने लगी| मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा ‘कोई बात नहीं, आगे से सभी के साथ अच्छा व्यवहार करो’ ये कहकर चले गये|
इस घटना से हमें ये सीख मिलती है कि क्षमा करना ये कोई कायरता नहीं परंतु यह वीरता हैं| जैसे क्राइस्ट, उनका जीवन भी हमारे सामने एक प्रेरणात्मक मिसाल हैं| जब उनके शरीर में खिले ठोके गए तब भी उनके अन्दर से यही क्षमाभाव के बोल थे ‘भगवान, इन्हें क्षमा कर देना, ये अन्जान है, इन्हें क्षमा कर देना…….’ आज भी इस दृश्य को महसूस करते है तो रौंगटे खड़े हो जाते है कि नफरत की चरमसीमा को पर किए हुए लोगों के अत्याचार को सह कर भी, किसी के दिल से क्षमा की सुगंधी भावना उदित हो सकती है? महान आत्माओं का यही तो आभूषण हैं|
हम जो औरों को देते है वही हमारे पास आता हैं| दुनिया कहती है ‘Tit for Tat, इट का जवाब पत्थर से’ परंतु ‘अपकारियों पर उपकार करना’ हमें सीखना है| कोई कितना भी गलत हो परंतु हमें उनको क्षमा करना है| उनकी बातों को चित्त पर न रख आगे बढ़ते जाना है|

ओम शान्ति

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प्रकम्पन

लोग जहाँ पर रहते है|
उस जगह को वो घर कहते है|
हम जिस घर मे रहते है|
उसे प्यार का मंदिर कहते है|

ये एक पुराने फिल्म की कुछ पंक्तियाँ है | जिस मे लिखा है कि घर और मंदिर अलग जरूर है पर जहाँ प्यार, सदभावना है वह घर भी मंदिर बन सकता है | मन से निकलने वाले संकल्पों की ऊर्जा अविरत हमारे आसपास तथा वातावरण मे फ़ैल रही है | देखा जाए तो किसी मकान को बनानेवाला builder रेत, ईट, सिमेंट भले किसी भी दर्जे का use करे परंतु उस मकान को घर, पाठशाला, व्यायामशाला, मधुशाला या मंदिर बनाना है वह तो उस जगह पर रहने वाले इन्सान की सोच पर निर्भर है |

आपने इस बात का अनुभव किया होगा कि हर घर के प्रकम्पन अलग-अलग होते है | यही नही परंतु हर व्यक्ति के हर दिन के, हर वक्त के प्रकम्पन भी अलग हो सकते है क्योंकि इन्सान की हर परिस्थिती की प्रतिक्रिया या सोच भी अलग होती है | आज कोई हमारे लिए अच्छा सोच रहा है तो उसके चेहरे से, आँखों से _____ जो प्रकम्पन निकलते है वह सकारात्मक महसूस होते है परंतु वही सोच अगर बुरी हो जाए तो नकारात्मक प्रकम्पन भी feel होते है |

कहते है ध्वनी से ज्यादा प्रकाश का वेग होता है | शब्दों से ज्यादा हमारे भावों का अर्थात संकल्पों का वेग है | आपने देखा होगा आजकल call करके बात करने के बजाए लोग message या whatsApp करना पसंद करते है | कोई इन्सान विश्व के किसी भी कोने में हो लेकिन आज उनके साथ सम्पर्क रखना बड़ा आसान हुआ है | विज्ञान ने इतने प्रभावी साधन हमे बनाकर दिए है, लेकिन मनुष्य का मन कई साधनों से भी प्रभावशाली है| मनुष्य किसी के लिए दिल से दुआ करता है, वह विचारों के प्रकम्पन उस इन्सान तक पहुँचते जरूर है | इन दुआओं का बल उसे कार्य मे सफलता दिलाता है | यही अगर बद्दुआ हो तो व्यक्ति को बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | इसलिए जब कोई समस्या आती है तो हम अपने नजदिक के संबंधियों को कहते है ‘ मेरे लिए दुआ करो कि ______’ दुआ दवा का काम करती है |

संकल्पों का प्रवाह पानी की तरह है | नदी एक दिशा मे निरंतर चलती है तो उससे सुख मिलता है | वही अगर अपनी सीमाओं को तोड़कर बहने लगे तो तबाही मचाती है | वैसे ही अपने विचार शांत और एक दिशा मे चले तो वह खुद को और औरों को सुख देते है, वही विचार, जोशभरे, दुर्भावनाओं से भरे हो तो वह अपने और औरों के जीवन को नुकसान पहुँचा सकते है | हमारी सोच किसी व्यक्ति के लिए जैसी होती है उसी अनुसार उस व्यक्ति के मन मे हमारे लिए वैसी सोच बन जाती है |

एक राजा और उसका एक मित्र था | मित्र का लकड़े का व्यापार था | एक बार वह अपने लकड़े के कारखाने मे गया | देखा बहुत सारे चंदन के लकड़े पड़े है | उनको देखकर सोच चली की इतने सारे लकड़े कैसे बेचे जायेंगे | फिर उसके अंदर अचानक सोच चली कि इस शहर की कोई नामीग्रामी हस्ती मर जाए तो मेरे लकड़े बेचे जायेंगे | उसको राजा का चेहरा दिखाई देने लगा | बार-बार उसके मन मे चलता था कि राजा की मृत्यू हो तो मेरे चंदन के लकड़े ख़त्म हो जायेंगे | राजा की मृत्यू हो , बार-बार यह विचारों का चक्र चलने लगा | वहाँ राजा भी सोचने लगा कि मेरे मित्र की इतनी सारी जायदाद है | इस के बाद उसे संभालने वाला वारिस कोई नही | अगर इसकी मृत्यू हो जाए तो सारी प्रॉपर्टी मेरे खजाने में जमा हो जाएगी | इसकी मृत्यू हो जाए______ राजा के मन मे बार-बार उसके मृत्यू के संकल्प चलने लगे | दोनो भी दूर रहकर एक दूसरे की मृत्यू के लिए सोचने लगे |

एक बार एक कार्यक्रम मे दोनो आमने-सामने हो गये | दोनों के अंदर चलने वाली सोच के कारण नजर से नजर मिलाना भी मुश्किल हो गया | बातचीत करते हुए भी अंदर विचारों का चक्र चल ही रहा था, फिर न रहकर दोस्त अपनी बात राजा को बताता है | राजा को आश्चर्य लगता है, वह भी अपनी दिल की बात बताता है | दोनो शर्मशार हो जाते है | राजा के मन मे सोच चलती है, वह अपने मित्र को कहते है ‘ मित्र, एक उपाय है | मै तुम्हारे चंदन के सारे लकड़े खरीदकर इससे एक मंदिर का निर्माण करता हु ’ यह सूनकर मित्र कहता है ‘ मै आपके ही दिए हुए धन से उस मंदिर की मूर्ति के निर्माण मे लगाता हु ’ | दोनो भी एक-दूसरे की सोच से संतुष्ट हो जाते है | धन की प्राप्ती और सदुपयोग से दोनों के मन तृप्त हो जाता है |

भावार्थ : – जैसे हमारे सोच के प्रकम्पन होंगे वही दूसरे की सोच बनती है इसलिए अपनी सोच तथा भावों को बदले |

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आध्यात्मिकता और ज्योतिष

मनुष्य जीवन अनेकानेक शुभाशुभ घटनाओं से भरा है| इन घटनाओं की प्रसंगों की शृंखला बनी रहती है| हर प्रसंग रहस्यों से भरा हुआ है| कई बार मनुष्य की बुद्धी उन बातों को समझ नहीं पाती, उस तर्क-वितर्क से बाहर निकलने के लिए फिर ज्योतिष विद्या का सहारा लेती है| जन्म, नौकरी, शादी, उन्नति या फिर कोई धन, सम्बन्ध …… की बाते हो, आनेवाला कल मेरा क्या होगा? ये जानने की उत्सुकता लेकर ये कमजोर मन उस दिशा में चला जाता है| लगता है कि कोई अनिष्टकारी ग्रह उनके वैवाहिक जीवन,नौकरी, क़ानूनी मामलों, व्यापार, पढाई, उन्नति, परीक्षा या करिअर में मिलनेवाली सफलता को बाधित कर रहा है| ऐसे समय पर अगर पूजा-पाठ करवाने की या कोई ग्रह की अंगूठी पहनने की सलाह दे तो वह भी स्वीकार कर लेते है|
भौतिक ग्रह और नक्षत्र, विभिन्न उर्जाओं के प्रतिक है| जब खगोलीय उर्जाओं का संजोग होता है तो एक नईं उर्जा उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव सारे सृष्टीपर तथा हरेक के जीवनपर पड़ता है| यदि इन उर्जाओं का ज्ञान पाकर हर परिस्थिति को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखे तो यही ज्ञान आत्मउन्नति का शक्तिशाली साधन बन सकता है|
कहा जाता है ‘ life is an Examination Hall’| हर आत्मा को अपने जीवनकाल में कुछ सबक सीखकर आगे बढ़ना होता है| जब तक वह नहीं सिखती तब तक वही-वही परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है| जैसे शरीर में अगर रोगप्रतिकारक शक्ति कम हो जाए तो बार-बार बुखार या सर्दी-खाँसी होती रहती है वैसे ही जीवन में उन्ही बातों से बार-बार झुंझना पड़ता है|
व्यक्ति की जन्मकुंडली ग्रहों की स्थिति को चिन्हित करती है जिस पल आत्मा नए शरीर के रूप में जन्म लेती है| यह कुण्डली आत्मा की कर्मकहानी दर्शाती है| आत्मा को मिला हुआ शरीर रूपी वस्त्र सुन्दर है तो समझा जाता है कि कुछ पुण्य साथ में लेकर आये है परन्तु अगर वह त्रुटीयोंवाला है तो पिछले कर्मों का हिसाब साथ में लाए है| इसके साथ-साथ आत्मा को इस जीवनकाल में कौन से अनुभव प्राप्त होंगे, जो शिक्षाए प्राप्त करनी है उसका तरीका आसान होगा या मुश्किल यह भी समझ पाते है| मान लो कि कोई ग्रह मंगलकारी है तो यह संकेत है कि आत्मा पूर्व जन्म में बहुत से सबक सीखकर आई है अगर वह अनिष्टकारी है तो परिस्थितिओं द्वारा वह सबक दक्षता पूर्वक सीखने होंगे इस इशारे को समझना है|
‘life after life’ के लेखिका कहते है कि जब कोई अचेतन (कोमा) की अवस्था में कई सालों से है, उसे अपने जीवनकाल में जो सीखना था realised करना था वह नहीं किया है तो उसे ये मौका मिला है कि उन गलतियों को महसूस करे| अगर महसूस कर लेते है तो उस शरीर से मुक्त हो जाते परन्तु स्वीकार या सीखने की शक्ति नहीं है तो दोबारा उसी शरीर में जागृत होकर उनको सीखना अनिवार्य है| जैसे हर विद्यार्थी को हर कक्षा की जो भी शिक्षाए है उसे ग्रहण कर आगे बढ़ना होता है| कोई फेल हो जाता है तो उसे दोबारा उसी कक्षा की परिक्षाए देनी पड़ती है वैसे ही जीवन भी एक पाठशाला के समान है, यहाँ पर भी सभी को सीखना है|
जो हो रहा सब अच्छा है
हमारी जन्मकुण्डली हमारी आन्तरिक शक्तियों का मापदण्ड देती है| आनेवाली समस्याओं का डट के सामना कर पाएंगे या डर जाएंगे| मान लो हमारे सामने करिअर को लेकर या फिर संबंधो को लेकर कोई बात आयी है उसके प्रति सुझाव प्राप्त करने ज्योतिषी के पास गये, वह हमें कहे कि इस वक्त आपका इस स्थान का ये ग्रह वक्री है आप हर कदम सोच समझकर ऊठाना ……… जब ऐसी बाते सुनते है तो उसका पहला असर हमारे मनपर होता है | डर पैदा होने के कारण उसका परिणाम शरीरपर, व्यवहार पर …….. होने लगता है| जीवन में आई हुई किसी भी बात को हम अनदेखा करे या उससे भागने की कोशिश करे तो वह टल जाएगी ऐसा नहीं लेकिन उसको स्वीकार करना तथा तटस्थता और निष्पक्षता का गुण धारण कर उस परिस्थिति को अलग-अलग पहलू से देखने का नजरिया बढ़ाना चाहिए| हर बात को आध्यात्मिक दृष्टी से देखे तो यही मन में गूंज ऊठेगा कि ‘जो हो रहा है अच्छा है’| हर घटना हमें अनुभवी तो बनाती है साथ-साथ हमारे अन्तर के पट भी खोलती है|
सकारात्मक उर्जा
जब मनुष्य परिस्थितियों के घेरे में आ जाता है तब उसे कोई मंत्र का उच्चारण या किसी विशिष्ट रत्न की अंगूठी या फिर कोई रंग के वस्त्र या चीजों का प्रयोग …….. अनेकानेक बातों की सलाह दी जाती है जिस से उस परिस्थिति का असर कम हो जाए| जो भी साधन अपनाए जाते है वह सारे प्रतीकात्मक रूप है| उनके इस्तमाल से मन व्यर्थ या नकारात्मक भावों से बचकर सकारात्मक बन जाता है परन्तु इनका परिणाम अल्पकालिन है| समझो किसी को व्यर्थ या नकारात्मक सोचने की लत लगी हो तो वह कुछ भी पहने या ओढ़े परन्तु इन साधनों का उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता| आध्यात्मिकता अर्थात ही जो इन ऑखो से देखकर असंतुष्ट हो जाते है उन्ही को मन की ऑखो से देखकर उसके सत्य की खोज में गहरे उतरना| जिस सत्य को समझकर मन में उठनेवाले हर तुफान को शांत कर सको| हर घटना का नकारात्मक रूप न देख उस से अच्छाई को ढूंढ वह चित्त में रख आगे बढ़ते जाना|
हमारे मन में अद्भूत शक्तियाँ है| हर विचार हमें नया जीवन दे सकता है इतना विचारों में बल है| इसलिए मनोवैद्यानिक भी इस बात की पुष्टी देते है कि ‘जैसा हम सोचते है वैसी परिस्थितियों को, व्यक्तियों को …… आकर्षित करते है’| विचारों की धारा नकारात्मक दिशा में प्रवाहित है तो वैसे ही लोग सम्पर्क में आएंगे, वैसी ही घटना होती रहेगी| समझो कोई लगातार ‘मै बिमार न हो जाऊ …. ’ ऐसा सोचता है तो वह सच में बिमार पड़ जाता है परन्तु बिमारी अवस्था में भी अगर कोई खुश रहता है, उमंग भरी सोच रखता है तो वह उस अवस्था से जल्दी बाहर निकलता है| इसलिए बात कोई भी हो परन्तु मनुष्य अपनी सकारात्मक सोच से हर परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकता है| असंभव कार्य संभव हो सकते है, सिर्फ सोच पर ध्यान देना जरुरी है|
आन्तरिक विकास का मार्ग
एक ही स्थान और समय पर जन्म लेनेवाली दो आत्माओं की जन्मकुंडली एक जैसी हो सकती है लेकिन उनका जीवन भिन्न हो सकता है| क्योंकि हर आत्मा की यह व्यक्तिगत यात्रा है| इस यात्रा में हर एक के पास की पूंजी, विकास का स्तर, सोचने का ढंग अलग है| मिली हुई उपलब्ध उर्जाओं को अभिव्यक्त कैसे कर रहे है? ज्योतिष की भूमिका मात्र इतनी है कि वह मार्गदर्शक बन जागरूकता, साहस, चुनाव और शक्ति के साथ चलना सिखाता है| परन्तु हमारे आन्तरिक स्तरपर काम करने तथा आत्मविकास करने की उपलब्धि प्राप्त करने का चुनाव पूर्णतः व्यक्तिगत है| हमें सशक्त बनना है या निर्बल, यह तो हमारे हाथ में है|
हमारे जीवन में परमात्मा की भूमिका
कई मनुष्य इस मान्यता को लेकर चलते है कि भगवान की कृपा होगी तो हमारे जीवन का दु:ख, परिस्थितियां खत्म हो जाएगी इसलिए विशेष किसी देवी-देवताओं की पूजा या कोई विशेष मन्त्र उच्चारण कर उन्हें खुश करने का प्रयास किया जाता है| परन्तु परमात्मा ऐसे खुश हो सकते है? कहते है ‘जीवन में जब कोई दु:ख आता है तो समझना चाहिए कि अच्छे कर्म करने की सक्त जरूरत है’|
परमात्मा की कृपा हमारे ऊपर तब हो सकती है जब हम उनके बताए हुए मार्ग पर चले| उन्होंने दी हुई मत का पालन करे| सच्चाई की राह पर चल सत्कर्म करे इसलिए कहते है ‘सच्चे दिल पर साहेब राजी’| परमात्मा एक अच्छा टिचर भी है तो गाइड भी है| क्या करना चाहीए क्या नहीं उसकी समझ जरूर देता है लेकिन हमारे कर्मो में तथा भाग्य में दखल अंदाजी नहीं करता| अगर भगवान ही सभी का भाग्य बनाता है फिर सब का एक जैसा क्यू नहीं? कोई अमीर तो कोई गरिब, कोई बुद्धीवान तो कोई बुद्धीहीन …… क्यू है? वास्तव में हम ही हमारे भाग्य के निर्माता है|
आध्यात्मिकता और ज्योतिष इन में फर्क इतना है कि आध्यात्मिकता हमें खुद को बदलने की, आत्मपरिक्षण करने की प्रेरणा देती है| ‘खुद बदलो, जग बदलेगा,’ ‘स्व-परिवर्तन से विश्व परिवर्तन’ कहते है| हम अपने अंदर झाँकना सिखते है| आध्यात्मिक ज्ञान से जीवन के जटिल सवालों के जवाब मिल जाते है| जीवन को सही तरीके से देखता और जीना सिखाती है| ज्योतिष विद्या हमारे जीवन में आनेवाले कुछ पलों की थोडीसी आहट जरूर देती है परन्तु परिस्थितियों को परिवर्तन करने के बाहरी इलाज बताती है| स्वयं पर मेहनत करने के बजाय हम व्यक्ती या समस्याओं को बदलने की मेहनत करते| इस प्रयास में कभी निराशा का, असफलता का भी अनुभव होता है|
आध्यात्मिक पथ पर चलने वाला साधक परमात्मा का साथ पाकर, मिली हुई ज्ञान की रोशनी से उलझनों में भी सही मार्ग को भाँप लेता है| ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा और स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखने से मनुष्य आनेवाली मुश्किलें को पारकर सफलता के शिखर पर पहुँच जाता है|

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विचारों की जागृतता

हेरोल्ड शेरमन (harold sherman) नाम का एक लेखक और नाटककार था | रेडिओ के एक नए कार्यक्रम के नूतनीकरण में उसे वचन दिया गया कि आप के साथ हम कायम स्वरूपी करार करते है लेकिन कुछ ही महिने बाद उनको कुछ भी न देकर वहाँ से हटाया गया | इसके कारण उसे बहुत सी आर्थिक और मानसिक परिस्थितीयोंका सामना करना पड़ा | मन में बार-बार अन्याय के खिलाफ झुँझने के विचार आते थे | अधिकारीयों के द्वारा किया हुआ विश्वासघात उसके मन मे बदले की भावना पैदा कर रहा था | वह खुले आम यह भी कहता था कि मेरे मन मे उन अधिकारीयों का खून कर दू, इतना तिरस्कार है | उस नफरत के कारण कुछ ही समय मे उसके शरीर मे बिमारीयाँ आने लगी | उसके गले की अत: त्वचा मे fungus infection होने लगा | कई इलाज भी किए गए परंतु कोई असर नही हुआ | जब उसने उस नफरत को ख़त्म किया, उन अधिकारीयों को माफ़ किया तब उसकी व्याधी मे सुधार आया | वैद्यकीय उपचार और बदली हुई मानसिकता ने उसे यातना मुक्त किया |

वर्तमान समय एक ओर हम विकास की ओर आगे बढ़ रहे है लेकिन दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा, आधुनिकता, वस्तुओं का संग्रह ——- भी बढ़ रहा है, जिससे विचारों का प्रदुषण हो रहा है | हम जिस प्रकार के विचार करते है उसका असर हमारे शरीर पर अवश्य होता है | विचार एक ऊर्जा है, जो निरंतर इस देह को सकारात्मक या नकारात्मक प्रवाहित हो रही है | जितनी सकारात्मकता बढ़ती है उतना शरीर स्वस्थ, निरोगी रहता है, परंतु मन मे अगर भावनिक द्वंद्व हो, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, असंतोष जैसी नकारात्मक भावना हो तो शरीर में मधुमेह, रक्तदाब, कैन्सर, जैसी बिमारीयाँ घर कर लेती है | एक बार इन बिमारीयों ने अपना स्थान बना लिया फिर इससे छुटकारा पाना बड़ा मुश्किल |

जैसे शरीर के किसी अंग को बार-बार चोट लगे तो वह अंग या शरीर का हिस्सा कमजोर हो जाता है या जब तक वह पूरी तरह से ठीक न हो तब तक उसे संभालना जरुरी हो जाता है | वैसे ही बार-बार आनेवाली परिस्थितीयाँ मन पर भी बुरा असर कर जाती है | अगर हम बार-बार दुःखी, नाराज, परेशान, चिंताग्रस्त हो रहे है, तो मन भी इन विचारोंसे कमजोर बन जाता है | मन को निरोगी बनाने के लिए अटेन्शन से श्रेष्ठ विचारों का भोजन देने की जरुरत है | छोटे बच्चे को जैसे पोषक आहार जबरदस्ती से खिलाना पड़ता है वैसे ही हम इस मनरूपी छोटे बच्चे को थोड़े-थोड़े समय मे शुद्ध, सकारात्मक विचार देते रहे | कुछ दिनों के इस अभ्यास से भी हमारा मन भावनिक रित्या मजबूत बन सकता है |

एक अच्छी माँ घर के सभी कार्य करते हुए बच्चे को संभालती है, उसपर नजर रखती है | हम भी सभी कार्य करते हुए इस विचारों के प्रवाह को बार-बार चेक करे, कही गलत दिशा मे तो नही सोच रहा है ? कही गलत सोच चल भी रही हो तो बड़े प्यार से उसे समझाकर सही रास्ते ले आए | कहा भी जाता है ‘ मन को दमन न करो लेकिन सुमन बनाओ’ | आज किसी इन्सान को पूछो आपको खाने मे क्या पसंद है , तो कुछ चटपटे, मसालेदार पदार्थ उसमे जरूर होंगे | कोई भी करेले की सब्जी पसंद नही करेगा बल्कि सेहत के लिए वो गुणकारी है | श्रेष्ठ, शुभ विचार भी मन के लिए गुणकारी है परंतु जैसे कोई करेले की सब्जी के दो-चार टुकड़े ही खा सकता है, ज्यादा नही वैसे ही मन मे लगातार श्रेष्ठ चिंतन करना हमारे लिए करेले की सब्जी की तरह है | आयुर्वेदा मे सेहत को ठीक रखने के लिए सुबह खाली पेट कोई ज्युस या कोई दवाई खाने के लिए कहा जाता है | समझते है उसका असर ज्यादा होता है | मन के लिए भी वही technique है | कोई कारोबार शुरू करो उसके पहले हम भी दिन की शुरुआत श्रेष्ठ विचारों से करे जिसका असर लम्बे समय तक चलता है | सुबह का समय और उसमे अच्छे विचारों का सेवन करे जिसके कारण दिनभर आनेवाली अनेक परिस्थितीयों को पार करने की शक्ति हमे मिल जाती है | मन की सेहत भी अच्छी रहती है |

आज सभी तंदुरुस्ती के लिए जितने जागृत हुए है, उतने ही विचारों के लिए भी जागृत हो जाए क्यों कि आज विज्ञान भी इस बात को मानता है कि जो भी आज रोग हो रहे है, वह 80 % मनोदैहिक है | मन से उत्पन्न होने वाले विचारों का असर है | इसलिए मन को स्वस्थ करने पर पूरा ध्यान दे | ‘ मन स्वस्थ तो तन स्वस्थ ’ हो जाएगा |

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