धनुष्यबाण

बचपन में टेलीविज़न पर रामायण या महाभारत देखते थे, उस में  युद्ध के कई दृश्य देखकर मन में सवाल उठता था कि धनुष्य से निकले हुए बाण से किसी को घायल भी करते थे तो आकाश से फूलों की मालाए पहनाई जाती थी, पुष्पों की वर्षा भी होती थी |   यह सब कैसे हो सकता है ?  कहते है धनुष्य से निकला हुआ तीर फिर भी वापस आ सकता है लेकिन मुख से निकला हुआ शब्द कभी वापस नहीं आ  सकता |   हमारे बोल का अपने और औरों के जीवन पर बड़ा गहरा असर पड़ता है |  कहते है “ हमारी वाणी किसी को तख़्त पर तो किसी को तख्ते पर भी चढ़ा सकती है ” |

शरीर के हर अंग का अपना-अपना महत्व है | हमारे होठों की बनावट को थोड़ा ध्यान से देखे तो वह धनुष्यबाण की तरह है | जब यह मुख खुलता है तो इससे तीर की तरह घायल करने वाले शब्द रूपी बाण भी निकल सकते है या शब्दों रूपी पुष्प भी निकल सकते है |  बुद्धी रूपी तरकश में जो कुछ भरा हुआ होगा, उसी का इस्तमाल इस मुख के द्वारा अर्थात ही धनुष्य से करते है |   युद्ध में आपने देखा होगा अलग-अलग किसम के तीर हुआ करते थे |  कोई आग के गोले की तरह, कोई त्रिशूल की तरह,  कभी-कभी तो एक ही तीर छोड़ा जाता था लेकिन उसी तीर के जैसे 5-10  तीर और निकलते थे |  हमारे बोल का भी ऐसे ही है |  हमारे बोल कभी किसी को जलानेवाले, किसी को बिल्कुल नीचे गिरानेवाले , और ऐसा भी कभी हम बोल देते है जो एक ही लाइन में दस बातें सुना देते है |

कहते है, ‘ मीठी वाणी बोल रे मनवा ……’  वाणी का माधुर्य और चातुर्य हमारे चरित्र को बनता है |  मनुष्य अंदर से कैसा है वह उसके बोल से पता चलता है |  वाणी से भी मनुष्य की पहचान होती है |  शब्दों का प्रयोग किस भावना से या उद्देश्य से किया जाता है,  उस अनुसार उसे नाम दिया जाता है |  किसी महंत की वाणी जो जीवन में मार्गदर्शन कराती है उसे गुरुवाणी कहा जाता है |  किसी शब्दों में बहुत मिठास भरी होती है तो उसे मधुर वाणी कहा जाता है|  कोई किसी के लिए कटाक्ष भरे बोल बोलता है तो उसे कटू वचन कहे जाते है |

कभी हम अपने को देखे कि हमारे शब्द या वचन किस रिती से प्रयोग होते है |  इन शब्दों में कौन से भाव भरे हुए होते है ?  भावना और शब्द इनका संतुलन बहुत जरुरी है क्यों कि वही शब्द तीर के समान प्रभाव डालते है  जिन में वैसी भावना भरी हुई हो |  मान लो आप किसी को अच्छे और बुरे की समझ दे रहे है, सामने वाला हमारी बातों को सुन रहा है,  लेकिन अगर हम समझाते हुए उस व्यक्ति के लिए सोच रहे है कि “ ये तो कभी सुधरने वाला नहीं है ” तो हमारे बोलने का उस पर कोई असर नहीं होगा |   वह हाँ – हाँ कहकर वही करेगा जो उसे सही लग रहा है | आपने कई महात्माओं के जीवन चरित्रो में पढ़ा होगा कि उनके मुख के निकले हुए कुछ वचनों को सुनकर चोरों ने भी अपनी बुराइयों को त्याग जीवन को नयी दिशा दी |  ऐसा क्या था उनकी वाणी में जो कईयों के जीवन परिवर्तन के निमित्त बने |   शब्द और भावनाओं का मेल इतना शक्तिशाली था कि हृदय से निकले हुए बोल सामने वालों के हृदय को छु जाते थे | उसी से बड़े परिवर्तन हुए |

हम भी मन और वचन दोनों में समरसता लाए जो विचारों में है वही बोल में लाने का प्रयास करें |  क्यों कि आज हमारा दुहेरी व्यक्तित्व बनता जा रहा है |   सोच में कुछ और है, बोलते कुछ और है|  अगर सोच में गलत है फिर भी बोल में मिठास ला रहे है क्यों कि सामने वाले को अच्छा लगता है |  लेकिन अगर वह गलत है, तो शुद्ध भावना से उसे कहने में कोई हर्जा नहीं है लेकिन ऐसा न करना माना हम अपने से और औरों से ठगी कर रहे है |  सत्य कड़वा नहीं होता लेकिन उसे बताने का तरीका कड़वा न बनाए |   उसे मीठे अंदाज में भी कहा जा सकता है |

हम अपने कर्मों पर जैसे ध्यान रखते है, ऐसे ही सोच और बोल पर भी ध्यान रखे |  कर्मों से दुःख देना पाप मानते है वैसे ही सोच और बोल से भी हम औरों को दुःख देते है, उस से भी पाप कर्म बनते है इसलिए सोच-समझकर बोल का भी इस्तमाल करे |

‘ कम बोलो, धीरे बोलो और मीठा बोलो ’  इस स्लोगन को सदा याद रखे |  ‘बोलो’ इस शब्द में भी रहस्य छिपा है |  ‘बो + लो’ शब्दों से भी कर्म रूपी बीज बोते है |  ‘ जो बोते है वही पाते है ’ अगर हम मीठे या कटू वचन बोलते है तो प्रतिक्रिया में हमें वही प्राप्त होता है |  इसलिए जो हम औरों से अपेक्षा करते है, कि यह मेरे से प्यार से बोले, शान्ति से बोले, तो हमें सर्व प्रथम वो उन्हें देना होगा, तो ही तो वह हमें रिटर्न में मिलेगा |

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अनुशासन

मनुष्य जीवन अति दुर्लभ मानते है और सब से बुद्धीशाली प्राणी भी उसे कहा जाता है |   कुछ कर दिखाने की चाहना वाले ही अपने जीवन में कुछ बन पाते है |   नहीं तो कई सिर्फ जीवन काटते हुए ही नजर आते है |  हर मनुष्य अपने में स्वतंत्र विचारों वाला, कार्य में स्वतंत्र रहने वाला जीवन पसंद करता है |   स्वतंत्र और परतंत्र यह शब्द हम भारत की आज़ादी से लेकर सुनते आए है लेकिन क्या इसका सही अर्थ भी हमें ज्ञात है ?  स्वतंत्र अर्थात स्व + तंत्र = स्व (अपना) तंत्र या अपना विधान और परतंत्र अर्थात दूसरे के विधान या तंत्र अनुसार चलनेवाला |   स्वतंत्रता में विवशता नहीं होती परंतु स्वयं को अनुशासित रखता है |   जीवन को सही मार्ग पर ले जाने के लिए अपने को विधानों में बांधे रखता है |

जैसे नदी का पानी अपने किनारों की मर्यादा में रहकर बहती है तो समाज के लिए जीवनदायिनी और कल्याणकारी रहती है | वही अगर अपने तटों की मर्यादा या बांध को तोड़कर बहने लगे तो वह तबाही मचा देती है |  अगर वह स्वेच्छाचारी होकर बहने  लगे तो विध्वंसक, भयावह बन जाती है |   ऐसी नदी दूसरों के अस्तित्व को संकट में डालती ही है परंतु उसके अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाते है |  कहने का भाव यह है कि अनुशासन की मर्यादा में रहकर ही विकास और कल्याण कर सकते है |

अनुशासन अर्थात अनु + शासन अर्थात शासन के अनुसार |   अपनी इच्छा से, अपने कल्याण के लिए कुछ नियमों, बंधनों, मर्यादाओं का स्वीकार करना ही स्वतंत्रता है और उनको अमल में लाना या पालन करना ही अनुशासन है |  रोजमर्रा के जीवन में बच्चे से लेकर बूढ़ों तक हर एक के लिए जीवन जीने के कुछ तरीके बनाए गये है |  वह सभी के लिए होते है लेकिन उन पर चलते रहना माना अपने को अनुशासित करना |  जैसे बच्चे को स्कूल में पहुँचने का समय तय किया होता है, वह उस अनुसार समय के पहले या समय पर पहुँचने के लिए कर्म करें, ये उसका अनुशासन है |  वह भी इस नियम को स्वीकार कर उसे अपनाता है |   स्कूल, ड्रेस, I – card —– जो नियम बनाए  है, उनपर सही रिती से चलना माना अपने अंदर अनुशासन लाते रहना |   सिर्फ स्कूल नहीं लेकिन समाज के हर वर्ग को भले वह हॉस्पिटल, होटल,कॉलेज, लाइब्ररी, मंदिर, बगीचा —– हर जगह के कुछ नियम बनाए हुए है, जो भी वहाँ जाता है उसे उनका पालन करना अनिवार्य है |   अगर उसका पालन नहीं करते तो फिर शासन उन्हें अनुशासित कराता है |  जैसे नदी अगर अपनी किनारों की मर्यादा को तोड़कर नुकसान करे तो उसको भी बांध डाले जाते है |

वास्तव में आज मनुष्य का अपने पर तंत्र नहीं है इसलिए कई चीजे बंधन लगती है जैसे बच्चे को पढाई में रूचि नहीं है तो उसे स्कूल में जाना ही बंधन लगता है |  कोई आलसी  है तो उसे ऑफिस पर समय पे पहुँचना भी बंधन लगता है |  और कई तो अपना हर कार्य मूड के अनुसार करना पसंद करते है लेकिन हमारे मूड तो बार-बार बदलते है तो फिर क्या |  ऐसे कर्म करेंगे तो सही समय कार्य पुरे कर  पाएंगे ?

कुछ कार्य हमारे जीवन में ऐसे होते है कि वह आपको करने ही है उसके लिए मूड हो या न हो | मूड माना मनोदशा | जीवन में जिसने कोई लक्ष्य बनाए है वह इस मनोदशा के व्यूह में नहीं फँसता |   हर दिन के कार्य के लिए वह अपने को बांध देता है जिस से वह सदा कार्यरत रह सके |   आज जिन्हों ने भी अपने रेकॉर्ड कायम किए उनका उस कार्य के प्रति पूरा समर्पण दिखाई देता है |  मन में उसको पाने की जबरदस्त लगन और अपना अनुशासन ही उन्हें उस मुकाम तक पहुँचा पाया है |

अनुशासन हमें समय पर हर कर्म करने की ऊर्जा प्रदान करता है |   ऐसे व्यक्ति न खुद की इच्छाओं के, आलस्य के, कमियों के दास बनते है बल्कि औरों को अपना दास  बनाने की क्षमता रखते है |  आज किसी ने अपने लिए बनाए हुए नियम, औरों को भी नियम पर चलने के लिए बाध्य बना देते |   अनुशासन पर चलने वाला व्यक्ति ही हर कदम पर अपनी प्रगति का अनुभव करता है |   अपने अंदर की शक्तियों का विकास करते नजर आता  है |

जीवन के मूल्य को समझकर इसे मूल्यवान बनाना चाहते है तो स्वतंत्र रहकर अपने को अनुशासित करें |  ये बंधन ही हमें ऊँची मंजिल को छूने का सुख दे सकते है |

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श्राद्ध और श्रद्धा

भारतीय संस्कृति में अनेक प्रथाए, रीती-रिवाज चली आयी है |   भाद्रपद महिने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन,  श्राद्धपक्ष अथवा महालय पक्ष कहते है |   ये दिन जिन पितरो और पूर्वजों ने हमारे कल्याण के लिए कठोर परिश्रम किए, रक्त का पानी किया, उन सबका श्रद्धा से स्मरण करने के है |  वे जिस भी देह में हो उन्हें दुःख न हो, सुख और शांति प्राप्त हो इसलिए तो पिंडदान और तर्पण किया जाता है |

श्राद्ध अर्थात ‘ श्रद्धा यत क्रियते तत ’ |   श्रद्धा से जो अंजलि दी जाती है वह है श्राद्ध और तर्पण अर्थात तृप्त करना, संतुष्ट रहना |   इसलिए श्राद्ध के दिनों में जो भी परिवार के सदस्य थे उन्हें जो पसंद था, वह खिलाया जाता है, ब्राह्मणों को बुलाया जाता है |  इस रिती से गई हुई आत्माएं तृप्त रहे, उनकी आशीर्वाद की छाया हमारे उपर रहे इस मान्यता से कई कार्य किए जाते है |  यह नश्वर शरीर पाँच तत्वों में विलीन हो जाता है |   यह निसर्ग का नियम है परंतु आज भी उनके विचार, उनके कर्म हमारे मानसपटल पर है जिस से वह अमर बने है |  ऐसे पितर और पूर्वजों का पूजन करने के यह दिन |   लेकिन सिर्फ याद नहीं करना है लेकिन उनके प्रति भी कृतज्ञता के भाव  हमारे मन में हो |

मानव जीवन कई ऋणों में बंधा हुआ है |   यह श्राद्ध के दिन ऋणमुक्ती दिलाने वाले दिन है |   जिन्हों ने हमे जन्म दिया, जिनकी छत्रछाया में हम पले-बढे, जिन्हों ने अपने स्वार्थ का त्याग कर हमारे लिए दिन-रात मेहनत करके हमारी सभी ख्वाहिशों को पूरा किया,  अच्छे संस्कार डालने की मेहनत की |   उन पितरों का हम पर बहुत ऋण है | हमारे द्वारा ऐसे कुछ कर्तव्य हो जिन्हे उन्हें संतुष्टी मिले यही सच्चे अर्थ से श्राद्ध है |  श्राद्ध से श्रद्धा उत्पन्न नहीं है |   परन्तु आज श्रद्धा ही ख़त्म हुई है |   आज का मानव भावनाशून्य होता जा रहा है |  कुछ बातें परंपरा से करते हुए हमने देखा है |   इसलिए उसे कर रहे है |   उसके पीछे का भाव ही समझते नहीं |   कइयों को ये प्रथाए  मजाक भी लगती है |

पश्चिमी संस्कृती का चष्मा पहने हुए लोगों का तर्क यह है ‘ यहाँ ब्राह्मणों को खिलाया हुआ पितरों को यदि पहुँचता है तो बॉम्बे में खाया हुआ दिल्ली में रहनेवालों को क्यू नहीं मिलता ?   आज विज्ञान ने इतनी प्रगति की है कि भारत में बैंक में जमा किया हुआ धन अमेरीका में प्राप्त हो जाता है ,  विदेश में रहने वाले अपने स्नेही को हम यहाँ बैठे-बैठे देख सकते है, उन से बात कर सकते है तो क्या भक्ति भाव से, शुद्ध अंतकरण से और अनन्य श्रद्धा से किया हुआ श्राद्ध संकल्प शक्ति, मंत्र शक्ति से पितरों को तृप्त नहीं कर सकता ?

इस शरीर के अंदर की चेतना (आत्मा) भले वह कहाँ पर भी है लेकिन हमारे शुद्ध स्पंदन, हमारी भावनाए उन तक जरूर पहुँचती है|  जो भी इन दिनों में विधीयाँ की जाती है उस में सिर्फ दिल की भावनाए भरने की जरूरत है ?  सिर्फ करने मात्र नहीं करना है |   क्यों कि हमारा रिश्ता सिर्फ दैहीक नही है लेकिन वह तो आत्मा से है|   देह तो एक वस्त्र है, जिसे आत्मा धारण करती और छोड़ती है |

बचपन में जब श्राध्द के दिनों भोजन बनता था तो वो पहले घर के आंगन में रख कर देखते थे कि कौआ इसे छूता है या नहीं ?  और अगर नही छूता तो समझते थे कि शायद पितर हमसे नाराज है |  फिर मन ही मन उनसे माफ़ी मांगी जाती थी |   या फिर उनके जो सब से प्रिय रहे है उनके ही हाथों से वह भोजन रखा जाता था |   ये तो देखने में आता था कि प्रियजन के हाथों से रखे हुए भोजन का स्वीकार कौआ करता भी था |   लेकिन ये सच है कि हमारी भावनाए आज भी उन आत्माओं तक पहुँचती है |   संकल्पों का ये नियम है कि ‘ आप जो औरों के बारे में सोचेंगे वैसा ही और आपके बारे में सोचेंगे ’ |   अब जो बीत गया सो बीत गया |   बीते हुए पल लौटकर नही आ सकते |   परंतु हम इस श्राद्ध के निमित्त गयी हुए आत्माओं के सुख, शांति, सन्तुष्टता की याचना जरूर करे |

आज हम जिनके साथ रहते है, उनके लिए तो रोज शुभभावनाए रखे क्यों कि हम सभी को एक दिन जाना ही है |   जाने के बाद उनके नाम से करे ही लेकिन जो मेरे अंग संग रहते है उनकी संतुष्टी का आज ख्याल रखे |   मरने के पश्च्यात उनकी पसंद की चीज बनाए उसके बदले आज जो उन्हें पसंद है वह उनको जरूर दे|   क्यों कि हर कर्म का फल मिलता है – अच्छा हो या बुरा |  इसलिए हमें ‘ न दुःख देना है न लेना है ’ |  कोई भी बंधन मुझे खींचे ऐसे कर्म हम से न हो |  इस बात का जरूर ध्यान रखे |   नही तो रूप बदल बदलकर भी हम उन्ही आत्माओं से बार-बार मिलते रहेंगे |

 

इस श्राद्ध के निमित्त हम सर्व ऋणों से मुक्त होने की ईश्वर के पास याचना करे |

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रक्षाबंधन – पावन पर्व

भारत देश में अनेक त्योहार मनाए जाते है |  जन्माष्टमी, दशहरा, दिवाली……|  इन त्योहारों के पीछे कुछ कहानियाँ भी है |   कोई त्योहार विजय का, जन्म का प्रतिक है |   सभी का अपना महत्त्व है |   इन उत्सवों के दिनों में खूब रोशनी, आतिशबाजी, फटाके जलाए जाते है |  समझते है यही तो त्योहार मनाना है |  परंतु हर त्योहारों का आध्यात्मिक रहस्य है |  मनाने के पीछे कुछ बदलाव करने का उद्देश्य है |   इन्ही त्योहारों में एक त्योहार है रक्षाबंधन |

आज के मनुष्य को ऐसे तो कोई बंधन पसंद नही परंतु इस रक्षासूत्र को बांधने के लिए हर कोई तैयार होता है |  लेकिन क्या यह दिन सिर्फ भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतिक है ?  क्या रक्षा की जिम्मेवारी सिर्फ भाई की है ?  क्या बहनों को ही रक्षा की आवश्यकता है ?  पुरातन काल में रजपूत रानी कर्णावती ने हिमायू को राखी भेजी और उसने अपना सर्वस्व लगाकर उसकी रक्षा की |  इंद्रायणी ने इंद्र को राखी बांधी और इसी राखी के कारण उसकी रक्षा हुई और उसने खोया हुआ राज्य पाया |  अभिमन्यु को कुंतीने रक्षा सूत्र बांधा और जब ये सूत्र टुटा तब अभिमन्यु की हत्या हुई |  ऐसी कई कहानियाँ है |  इसमें भाई-बहन का कोई रिश्ता नहीं है |  इस त्योहार के दिन ब्राह्मण घर यजमानों को राखी बांधकर जाते है|  यह एक पवित्र धागा माना जाता है |

यह त्योहार ऐसा है जिसमे कोई आवाज, रोशनी नही |  परंतु ये प्यार के रिश्ते का बंधन है |  आज सिर्फ इसे मनाया जाता है परंतु वह भाव नही है |  बहन भाई को राखी बांधती है और उस धागे के बदले कुछ सौगात लेती है |  सिर्फ रिवाजी तरीके से मनाया जाता है |   बहन और भाई दोनो अगर एक-दूसरे से दूर रहते हो तो क्या वह रक्षा करने के लिए समय पर पहुँच भी सकता है ?

आज रक्षा की आवश्यकता सभी को है | लेकिन मनुष्य-मनुष्य की रक्षा कर सकता है ?  इस त्योहार में तिलक लगाना, राखी बांधना, मुख मीठा करना……… ऐसी रस्मे है |  इनका आध्यात्मिक अर्थ हमें समझना है |   तिलक यह आत्म स्मृति दिलाता है |   वास्तव में आत्मा की कभी हत्या नही हो सकती वह तो अजर-अमर-अविनाशी है |   यह तिलक आत्म स्मृति के साथ सभी को समान सम्मान भाव से देखना सिखाता है क्यों कि हर एक में कोई विशेषता या गुण भरा हुआ है |  आत्मा की रक्षा तो उसके अपने कर्म और ईश्वर स्मृति से ही हो सकती है |  जिनके पास पुण्य की धरोहर है उसका कोई बाल बाक़ा नही कर सकता | साथ-ही-साथ ईश्वर सर्वोच्च रक्षक है |   जिसे उसका साथ मिल जाए उसे किसी से डरने की आवश्यकता नही |

राखी बांधना यह संबंधो में सदा स्नेह बना रहे, रिश्तों के धागे अटूट बने रहे इसका प्रतिक है |  समय अनुसार संबंधो में दूरिया बढ़ती जा रही है |  उन्हें सुमधुर बनाने के लिए आपसी सामंजस्य, प्रेम बढ़ाने की आवश्यकता है |  मुख मीठा करना अर्थात सदा मीठे बोल बोलकर हम सभी के दिलों को खुश करते रहे |  इसलिए कहते है ‘ कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो ’ यह अच्छे बोल का प्रतिक है|

कुछ मिनिटो में पूरा होने वाला यह त्योहार है लेकिन इस त्योहार में संबंधो में पवित्रता, मधुरता बनाए रखने का संदेश मिलता है |   आज हर रिश्तो में वृत्ती गलत हो रही है |  फिर वो भाई-बहन का रिश्ता भी क्यू न हो इसलिए हर नारी के लिए हमारी दृष्टी, वृत्ती पवित्र बनी रहे इसलिए आज के दिन हम पवित्र रिश्ते निभाने का संकल्प ले |  वास्तव में गहरी बात तो समझने की यह है कि हम एक ही परमपिता परमात्मा की सन्तान है |  उस अनुसार आपस में सभी के साथ हमारा रिश्ता तो भाई-बहन का ही है |  इस सत्य को जान सभी के लिए सम्मान और स्नेह की भावना दिलों में बसाने का शुभ संकल्प इस त्योहार से ले | इसी समझ से हम आइये इस पावन पर्व को मनाए |

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जीवन रहस्य

आज का युग स्पर्धात्मक युग है |   बच्चे से लेकर बुढोंतक हर कोई हर प्रकार  की स्पर्धा कर रहा है |   हमें अगर कोई अपने घर में भोजन पर बुलाए तो यह देखा जाता है कि इन्होने कितने पदार्थ बनाए है फिर next time जब हम अपने घर इन्हे बुलाऐंगे तब दो पदार्थ ज्यादा ही खिलाऐंगे | स्पर्धा हर रीती से मनुष्य कर रहा है | शायद ऐसा करने पर उसे सुकून मिलता हो | परन्तु आज हम जीवन के रहस्यों को, नियमों को भूलकर या फिर उसका उल्लंघन कर अपनी मर्जी अनुसार जी रहे है |

मनुष्य का जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर उसके कर्मो अनुसार चलता है |  इसलिए हरेक की जीवन गाथा अलग-अलग दिखाई पड़ती है | लोग कहते है कि ‘खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जायेंगे’ परंतु न कोई खाली हाथ आता है और नाही जाता है | कर्म का हिसाब लेकर ही हम आते-जाते है | इसलिए हम अपनी या औरों की जीवन को देखकर सवाल न उठाए |   जन्म-मृत्यु और मृत्यु के बाद फिर जन्म इसके चक्र में हम सब बंधे है |  हर मनुष्य प्राणी अपने साथ कुछ पूंजी लेकर आता है | उस अनुसार ही उसको रिश्ते, शरीर, बुद्धी, धन, परिवार— मिलता है | जो भी प्राप्त है उसे वह कैसे use करता है उस अनुसार वर्तमान जीवन व्यतीत होता है | रोजमर्रा के जीवन में भल हम अपने लिए, परिवार के लिए जीते है परंतु थोडासा समय हम औरों के भले के लिए जरूर निकाले | कहते है ना ‘ बूँद-बूँद  से तालाब भरता है’ ऐसे ही छोटे-छोटे सुकर्म करके हम बूँद-बूँद जमा करे जो हमें अपने कठीण समय पर काम आ सके |

हर पल बीतता जा रहा है|  हम सोच, बोल से भी कर्म कर ही रहे है | कोई भी अपने कर्म  और उसके परिणाम से अछूता नहीं रह सकता |  जैसे हमारा जन्म कर्मों अनुसार होता है वैसे ही हमारी मृत्यु भी कर्मो अनुसार ही होती है |   किसी का accident से, कोई बीमारी से, कोई दंगे-फसाद में— हर एक के पीछे हमारे कर्म काम कर रहे है | परन्तु मृत्यु एक सिर्फ वस्त्र-परिवर्तन की प्रक्रिया है |  शरीर एक साधन लेकर हम आत्माएं कर्म करावा रही है |  मृत्यु शरीर का होता है न कि आत्मा का |  इस अदृश्य रहस्य को हम समझे |  कहते है  ‘कितना जीए उसका महत्व नहीं परंतु कैसे जीए उसका महत्व है’  विवेकानंद जी बहुत कम आयु जिए परंतु ऐसे जीए ही आज भी उन्हें अपना आदर्श मानकर कई उनकी विचारोंधारा को अपने जीवन में अपना रहे है |   मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह रोता है, दुनिया हँसती है परंतु हम ऐसा कर्म करें जो हम हँसे और दुनिया रोए |

इस छोटे से जीवन के अमूल्य लम्हे ऐसे ही व्यर्थ न गवाए |  बहुत कुछ है करने के लिए, जिसे करके हम औरोंको सुख, ख़ुशी— दे सकते है |  आख़िर हम साथ में लेकर ही क्या जायेंगे ?  स्थूल चीजे, साधन, धन, व्यक्ति—    सबकुछ तो यहाँ ही छूट जाएगा, अपने साथ जायेंगे सिर्फ अपने अच्छे बुरे कर्म |   कर्मों की गति का ज्ञान सदा अपने चित्तपर रखे क्यों कि जो हम औरों को देंगे वही हमारे पास आएगा |  हमें सुख चाहिए तो हमें औरों को सुख देना होगा | अगर हम दुःख देंगे तो वही हमारे पास आएगा |   इस philosophy को समझे |   यह कदापि नहीं हो सकता की मै औरों को सुख दु और मेरे पास दुःख लौटकर आए |   कभी किसी जन्म में हमने उनको दुःख पहुँचाया होगा तो वह आज मेरे पास आया है |   इस सत्य को समझकर हम कर्म पर ध्यान रखे |

दो मित्र थे |  एक का नाम था महेश, दूसरे का नाम था सुरेश |   दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती थी | परन्तु महेश बहुत ही भोला इन्सान था और सुरेश बड़ा चालाक था | एक दिन सुरेश ने सोचा क्यों नहीं कमाई करने लिए विदेश चलते है |   दोनों अपने परिवार से विदाई लेकर समुद्री जहाज से विदेश गये |  दोनोंने  खूब मेहनत की और अच्छी कमाई की |  फिर दोनों ने  एक दिन सोचा कि चलो अपने देश वापस चलते है |  अब इतना धन तो कमा लिया है जो आराम से बैठकर खा सकते है | वापसी यात्रा के समय दोनों मित्र समुद्री जहाज से वापस आने लगे |  दोनों के मन में अपने परिवार से मिलने की ख़ुशी थी |  परन्तु सुरेश के मन में एक दुष्ट विचार चल रहा था और उसने सोचा कि अगर मै  महेश को इस रेलिंग से धक्का मारकर समुद्र में गिरा दू और उसकी सारी कमाई भी ले लूँ तो किसी को पता ही नहीं चलेगा |   और लोग भी यही समझेंगे कि एक दुर्घटना थी |   यह सोचकर सुरेश ने महेश को धक्का दिया और वह जहाज से समुद्र में गिर गया और उसका सारा माल सामान और पैसे लेकर वह अपने गॉव पहुँच गया |   सुरेश ने महेश के  परिवार वालों को  बताया कि जाते समय ही महेश अकस्मात से समुद्र में गिर गया और वह अकेला ही विदेश में रहा था |   अब वह सारा पैसा कमाकर आ गया है |   देश में वापस आकर सुरेश ने अपनी पत्नी के साथ रहकर एक बड़ा व्यापार शुरू कर दिया |   थोड़े दिनों में उसके घर में एक बेटे का जन्म हुआ और उसके नामकरण पर बड़ी धूमधाम से कार्यक्रम रखा गया जिस में शहर के बड़े-बड़े लोगों को आमंत्रित किया गया |   उसी समय एक बड़े महात्मा भी आये थे, उन्होंने बच्चे का भविष्य देखा तो आश्चर्यचकित रह गए |   सुरेश ने पूछा कि क्या बात है ? तो वह महात्मा ने कहा कि आप इस बच्चे को गरिबी में पालना |   कहने का भाव यह था कि वो जो कहे तुरंत लाकर नहीं देना परन्तु कम से कम खर्च उसपर करना |  सुरेश ने महात्मा जी से कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी बात भी नहीं मानी |   जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता गया और मात – पिता का लाडला होने के कारण उसने जो भी चाहा उसके सामने हाजिर होता था |   बच्चा बड़ा हुआ, उसकी शादी तय की गयी |   परन्तु शादी के एक दिन पहले ही उसकी अकस्मात् मृत्यु हुई |  उसी समय वह महात्मा जी पुन: पधारे और उसने याद दिलाया कि उसने कहा था कि बच्चे को गरिबों की तरह पालना |  क्यों कि वह उसका कोई हिसाब चुकाने आया है और हिसाब चुक्तु करते ही वह उनके घर से चला जायेगा |   सुरेश ने मुनीम जी को बुलाया और उससे पूछा कि इस बच्चे के पीछे जो खर्चा किया था उसका हिसाब बताओ |  मुनीम जी ने सारा हिसाब जोड़कर बताया तो वह हिसाब देखकर सुरेश को बड़ा धक्का लगा | उसने देखा कि उसने जितनी महेश की कमाई हड़प की थी वह उतनी ही थी |  सुरेश तो वही हार्ट अटैक हुआ और वह मर गया | कर्मो की गुह्य गति भी कैसी है | सुरेश ने महेश तो धक्का देकर मार डाला, तो  महेश ने भी दूसरे जन्म में उसको धक्का दिया जो उसकी मृत्यु का कारण बना |   जितना धन सुरेश ने हड़प लिया था उतना ही महेश ने वापस ले लिया |

कर्म करो ऐसे भाई के पड़े न फिर पछताना एक दिन तो धर्मराज को पड़ेगा मुख  दिखलाना

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खुशनुमा जीवन

मनुष्य जीवन अनेक घटनाओंसे, प्रसंगोंसे…. भरा हुआ है | वर्तमान समय जिसे आधुनिक युग, स्पर्धात्मक युग कहा जाता है |  जिस में हर इन्सान कही न कही, किसी न किसी रिती से शामिल हुआ है | ऐसे जटिल समस्याओ में स्पर्धा में रहते हुए खुश रहना, ये तो जैसे सभी के लिए challenging है | आज अगर कोई tension free दिखाई देता है तो हमारे मन में सवाल उठता है कि  ‘कैसे हो सकता है कि tension न हो ?  टेंशन तो होना ही चाहिए’  अर्थात तनाव में रहना यह एक सामान्य बात मानी जाती है और तनावमुक्त रहना हमारे लिए असाधारण बात हुई है |

खुश रहने के लिए या खुशियाँ मनाने के लिए भारतवर्ष में कई त्यौहार, प्रसंग मनाए जाते है, जिस से मनुष्य सामाजिक कर्तव्यों में जुड़ा रहे और खुश भी  रहे | बात तो बड़ी अच्छी है लेकिन यह खुशीयाँ साल में कितने दिन या मास मनाएंगे | त्यौहार पूरा हुआ और ख़ुशी गायब |   इन्सान खुश रहने के कई तरीके अपनाता है जैसे पार्टी में जाना, घूमना, क्लब में जाना या फिर खरीदारी (shopping).  कुछ नहीं तो व्यसनों को अपनी ख़ुशी का आधार बना लेता है | मगर इन सभी से हमें खुशीयाँ कहाँ मिलती है ?  फिर भी हमारा दामन खाली ही रहता है | यह आधार आज है कल नहीं होंगे | जैसे कोई चीज मिली, कोई पदार्थ खाया या फिर किसी ने अच्छे से बात की फिर मैं  खुश रहू, अगर यह हमारी आदत बनायी है तो यह बातें हमेशा नहीं हो सकती | फिर हमें ‘ कभी खुशी कभी गम ’ में ही जीना पड़ेगा |

जैसे गर्मी का मौसम हो तो हम AC लगाते है, पंखा तेज करते है  लेकिन जब तक वह काम कर रहे है तब तक मुझे सकुन मिलेगा | अगर किसी कारण  से वह बिगड़ गए तो मेरी ख़ुशी भी बिगड़ गयी | जीवन को खुशनुमा: बनाने के लिए हमें ये सोचना होगा कि ‘ कोई भी बात मेरे सोचने अनुसार हो या न हो लेकिन मुझे खुश रहना है ’| ये संकल्प भी बहुत मदद करेगा |   हर बात में क्या अच्छा है वह ढूँढने की आदत को अपनाया तो आधी समस्याए  वहाँ पर ही ख़तम हो जाएगी | हमारे दुःखी विचार हमारे ख़ुशी को गायब करते है | हम सभी के जीवन में बहुत सरे सुखद पल आए होंगे, जो भी व्यक्ती हमारे जीवन में है उनके साथ ख़ुशी से पल बिताए होंगे उन सभी पलों को याद करके देखिए, आपको अच्छा महसूस होगा |  लेकिन हम वो सब न करके बार-बार बुरे पल,  नुकसान वाली घटनाओं को याद करते है और अपने अमूल्य वर्तमान को गम में बिताते है |

हमारा मन एक memory card है | आपने उस में क्या save किया है वो थोड़ा रूककर देखे | अगर कोई काम की बाते नहीं है, भले वो दृश्य हो या किसी की कही हुई बात हो जिसे sms कह सकते है ऐसे photos, sms, videos  हम delete कर दे|    दिनभर में भी कुछ अच्छा पढ़े, देखे, सुने..   उस से हमारा memory card (मन) भरे |  जब कभी वक्त मिले या फिर रूककर भी उन पलों को याद करें |  आप अनुभव करेंगे कि मेरी सोच का परिवर्तन ही मुझे ख़ुशी दिला रहा है |

लोग त्योहारों के दिन या फिर अच्छे प्रसंग के दिन खुश रहते है लेकिन आप इस बात को जाने ‘ जब आप खुश हो तब आप के लिए त्यौहार है ’|  आपने ये जाना होगा कि जिस दिन आपका मूड अच्छा होता है उस दिन आपको अलग-अलग पदार्थ बनाने की दिल होती है लेकिन जिस दिन मूड ऑफ़ होता है उस दिन आपको एक पानी का ग्लास उठाना भी मुश्किल होता है | आपकी क्षमता आपके विचारों के अनुसार कम या ज्यादा होती है | इसलिए खुशनुमा: जीवन के लिए कोई साधन, व्यक्ती, पदार्थ की आवश्यकता नहीं लेकिन उसके लिए ख़ुशी से भरे विचारों की जरूरत है | जैसे गुलाबजामुन में अगर छाचनी कम हो तो मजा नहीं आता , वड़ा  चटपटा न हो तो अच्छा नहीं लगता ऐसे ही विचार तो आ रहे है लेकिन उस में ख़ुशी न हो तो जीवन में मजा नहीं आता |

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चिंता नहीं लेकिन चिंतन करे

आज का मनुष्य जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है |   रोज कोई छोटी या मोटी परिस्थितियाँ हमारे सामने आती रहती है |  उन समस्याओं  की चिंता में हमारा मन बह जाता है |   विचारों की गति बढ़ जाती है | ऐसे में गुस्सा, भय, आवेश —–  कितनी   सारी मानसिक अवस्थाएं बनती है जो हमारे जीवन के लिए घातक है |

चिंता और चिंतन ये हमारे विचारों की अलग-अलग दिशाएं है |  नकारात्मक सोच हमें चिंता में डुबो देती है |   किसी के प्रति बहुत ज्यादा चिंता करते रहने से वह चिंता हमें चिता के समान जलाती है | हमारी ख़ुशी, आनंद—   सब अच्छाइयों को भस्म कर देती है | न हम खुश रह पाते, न औरों को ख़ुशी दे पाते है | लेकिन यही अगर हम चिंतन करने की आदत डाले तो वह हमें समस्याओं  का समाधान दिलाती है | जब कोई भी बात घटती है , उसे देख हमें लगता है कि सारे रास्ते बंद हुए है |  लेकिन चिंतन करने से हमें वह रास्ता दिखाई देता है,  जो हमें समाधान की ओर लेकर जाता है |

समस्याओं का चिंतन न करे परन्तु कोई भी परिस्थिती हमें कुछ सिखाने आती है , परिवर्तन कराने आती है, आंतरिक शक्तियों का विकास करने आती है |  उस परिस्थिती में हमें क्या करना चाहिए जो मेरे और औरों के हित में हो, उसको समझने का अभ्यास बढ़ाए | नहीं तो उन बातों को लेकर मन में तूफान ही उठते रहेंगे |  परंतु जब चिंतन वह भी सकारात्मक हो तो वह तूफान भी हमारे लिए तोहफा (gift ) बन जायेगा |

यह मनुष्य जीवन बहुत सुंदर  है |  उसे सहज बनाए |   बातों के जाल में फ़सने के बजाय हम उन बातों को भी मनोरंजन बनाए | कोई भी खेल खेलते है जैसे chess, cricket, football— हर खेल में किसी की हार तो किसी की जीत होती है | परंतु जो आज हार गया है वह अगली match में और बेहतर प्रदर्शन करके जीत सकता है |  वैसे ही जीवन भी एक खेल है | आनेवाली हर परिस्थिति में हम कुछ सिखकर आगे के लिए कुछ अच्छा पाठ पढ़ ले जिस से हम अपना विकास होते हुए, आगे बढ़ते हुए अपने को अनुभव कर सके |

बातों की गुत्थियाँ हमें उलझाती है, लेकिन उसमें सुलझने की युक्ती भी होती है |  जो चिंतन के माध्यम से हम जान सकते है |  वर्तमान समय लोग counsellor के पास जाते है,  अपनी problem का solution पूछते है | वह हमारी problem को अनासक्त होकर सुनता है  और समाधान बताता है | क्यू न हम ही अपने problem को detach होकर देखे, सोचे, समझे |  अपने मन को रोज खुद बैठकर counselling दे | क्यों कि हमारे सिवाए हमें जाननेवाला कोई दूसरा शक्स दुनिया में नहीं | हम खुद अपने को बेहतर जानते है |  व्यर्थ की चिंता करके हम ही बातों को पहाड़ जैसा बना देते है लेकिन वही सकारात्मक चिंतन करते रहे तो वही पहाड़ जैसी लगने वाली बात रुई के समान बिल्कुल हल्की लगेगी |

इस बात को हमेशा समझे की समस्या कुछ और नहीं लेकिन सिर्फ विचारों का खेल है | विचारों को ऐसे ही बहने न दे | परंतु उनके महत्व को समझ उसकी संभाल करे | हमारे विचार धन की तरह ही valuable है हम धन खर्च करते वक्त सोचते है ना  कि फजुल खर्च न हो | ऐसे ही मन के विचार भी ऐसे ही खर्च होने न दे |  इसकी बहुत value है | अब हम खुद ही सोचे कि हमें चिंता में जलना है या चिंतन की धारा को बदल कर चिंता का रूप भी बदल देना है ?

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सच्ची स्वतंत्रता

भारत एक प्राचीन देश माना जाता है| जहाँ अनेक कलाए, संस्कृती, भाषाए तथा परम्पराओं को हम देखते आए है | उन कला संस्कृती के द्वारा हमारे देश के ऊँचे संस्कारों का दर्शन होता था परंतु आज इस आधुनिक जगत मे उनका -हास होते नजर आ रहा है | इस वैज्ञानिक, आधुनिक युग में भी कलाए तो है परन्तु उनपर आधुनिकता का रंग चढ़ा हुआ देख रहे है |

भारत देश को धनाढ्य देश के रूप में भी पहचाना जाता है | भारत का इतिहास इस बात की गवाही भी देता है परन्तु इस देश को आझाद करने में कई क्रान्तिवीरों ने अपनी बलि तक चढ़ाई | एक तरह स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतियाँ की गयी | स्वतंत्र होने के बाद भी कई क्षेत्र में बहुत बड़े परिवर्तन लाये गए | स्थूल जगत में स्थूल परिवर्तन ला सके परन्तु बाह्य जगत का कनेक्शन हमारे अंतर्जगत से है |

रोजमर्रा के बढ़ते तनाव, बढती आबादी तथा कई समस्याओं को देखते शासन कई सुविधाए प्रदान करने में तथा कुछ बदलाव लाने की कोशिश करती रहती है परन्तु हर मनुष्य मानसिक स्तर पर आज कमजोर, दु:खी, दिशाहीन हो रहा है | खास कर देखा जा रहा है कि अपनी ही बुरी आदतों के वश हुआ इन्सान आज खुद को नाकाम कर चुका है |

भारत का स्वतंत्र – संग्राम जिस से हम सभी बहुत अच्छे से परिचित है | कई क्रान्तिवीरों ने अपनी बलि चढ़ाई | न खुद का हित देखा न परिवार का सुख | अंदर में एक जूनून सा छाया था कि बस कुछ भी करना पड़े – भले वो सहना पड़े या सामना करना पड़े परन्तु भारत माता को अंग्रेजों की गुलामी से हम आझाद करके ही रहेंगे | आज उन महात्माओं के, वीरों के बलिदान से हम सभी स्वतंत्रता का सुख पा रहे है | बाहर से तो कई अत्याचारों से गुलामीयों से हम मुक्त हुए है परन्तु एक सवाल उठता है की क्या हमें अपनी ही बुरी आदतों की गुलामी से कौन मुक्त करेगा ? ये कड़े पाश कौन तोड़ेगा ?

भारत एक धनाढ्य, ऊँची संस्कृती का देश माना जाता है परन्तु आज न स्थूल धन, न गुणों का धन हमारे पास है |ऐसे ही हम अपनी जीवन की यात्रा को देखे तो  नवजात शिशु में डर, चिंता, इर्ष्या, क्रोध ……… कुछ भी तो नहीं होता इसलिए बालक को महात्मा के समान माना जाता है | परन्तु जैसे-जैसे हम शरीर के आयु से बढ़ते जाते है, वैसे-वैसे कुछ संग का, कुछ वातावरण का, कुछ परिस्थितियों के गलत प्रभाव हम पर पड़ते जाते है | आज  उन बुराईयों ने दिमक की तरह हमें खोखला किया है | भले मानव अंबर की ऊँचाई यों को छुने के, सागर की गहराई को मॉपने के प्रयास कर रहा है | तकनीकी ज्ञान से तो भरपूर है परन्तु आज अपने आप से अंजान है | चरित्र की दुर्बलता और गुणों की गरिबी में जी रहा है | शायद जीवन का आधार स्थूल धन, वस्तु, पद ………. यही समझकर चल रहा है |

आवाज की दुनिया में जीनेवाले हम सभी आज अपनी ही आवाज सुन नहीं पा रहे है | एक और स्थूल वस्तुओं से जीवन का स्तर ऊँचा हो रहा है परन्तु दूसरी ओर मानसिक स्तर उतना ही नीचे गिर रहा है | मनुष्य का मन हर पल चिंता, भय, तनाव, दु:ख, अशान्ति …….. से भरता जा रहा है | बार-बार नकारात्मक सोच चलाने की आदत से मजबूर होने के कारण शारिरीक बीमारियाँ भी बढती जा रही है | इन सभी से अपने को स्वतंत्र करने के लिए संस्कारों की क्रांति करनी होगी |

हर एक मनुष्य में सही-गलत को पहचान ने की बुद्धी है परन्तु फिर भी कई आदते हमें गलत पथ पर खींचकर ले जाती है | ऐसी बुराईयों से मुक्त होने के लिए अपने मनोबल को बढ़ाना होगा | जैसे दुनिया में कुछ पाने के लिए व्रत, उपवास करते है वैसे बुराइयाँ हम पर हावी न हो जाए इसलिए व्रत लेना है | वैद्यानिकों के कहने के अनुसार अगर कोई भी आदत पक्की करनी है तो तीन दिन हम कड़ी मेहनत कर उस बात को धारण करे | अगर उसमे सफल हुए तो वह सात या ग्यारह दिन तक और आगे लगातार करने का प्रयास करे | इक्कीस  (21) दिनों तक अगर बिना खण्ड किए उस बात को कर लेते है तो वह मेरा संस्कार बन जाता है | फिर कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती | ऐसे दृढ़ता की शक्ति से हम अपने संस्कारों का परिवर्तन करे |

अगर इस संस्कारों के परिवर्तन में बार-बार अगर हार होती है तो हम अपने आपको शिक्षा दे | जिस चीज में आसक्ती है, जो अच्छा लगता है उसे छोड़े, उसका त्याग कर हम अपने को सजा दे | ऐसी सजा दे जिस से realization power बढे | एकान्त में बैठ अपने से बात करने की आदत डाले | self-counselling करने से कई बातों पर विजय प्राप्त कर सकते है क्योंकि ‘मन चंचल है, मन घोडा है’ इस बात के हम अनुभवी है | मन को वश कर लिया तो फिर और सारी बातें आसान हो जाती है |

कहते है ‘मनजिते जगतजीत’ | हर संस्कारों की शुरुआत संकल्पों से होती है वही पर अगर लगाम लगाई जाए तो धीरे-धीरे संस्कारों का नुतनीकरण कर सकते है | will power के साथ God’s power को भी अनुभव करे | परमात्मा का साथ लेकर, उनकी शक्तियों का सहयोग लेकर हम अपने पर नियंत्रण रखे जिसे meditation कहा जाता है |

Meditation अर्थात् मन को सुमन बनाने की कला | अच्छे विचारों का निर्माण करना | अच्छे विचारों के लिए रोज अच्छी किताबों का, अच्छे लोगों का संग करे जिस के कारण मन को नयी दिशा मिल सके | मन में नया उमंग-उत्साह आ सके | एक अच्छा संग भी हमें बुराइयों के प्रभाव से मुक्त कर सकता है | तो आइये, आज से हम अपने ही गलत संस्कारों का दृढ़ता के बल से खात्मा करे | इस मनुष्य जीवन को नए अंदाज से जिए | हर दिन नया हर पल नया करे | सकरात्मक विचारों का ऐसा सूर्य उदय हो जो बुराइयों की रात का अस्त अपने आप हो जाए |

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शुभ भावना

सुबह आँख खोलते ही हर कोई अपने मोबाइल को देखता है. व्हाट्सअप ओपन करके सबको गुड मॉर्निंग ,सुप्रभात........ के मेसेज भेजते है. बात तो बडी अच्छी है लेकिन किसी के भेजे हूए मेसेज को फॉरवर्ड करते है . पुराने जमाने मे लोक कहा करते थे की आंख खुलते ही भगवान को,पाच तत्वो को, अपने परिवार के सदस्यों को शुक्रिया जरुर करे, जिनके कारण हम है. आखिर बात तो भावनौंकी है.हम रोज जितना हो सके अपने संपर्क के सभी लोगों को मेसेज भेजो मगर ऐसे हि नही, सच्ची भावनाओं के साथ. जो भावना आप उनके लिए रखेंगे वही आपके पास लोटकर आयेगी.
रामायण मी शबरी के मीठी बेर का किस्सा दिखाते है . उसकी उन उची भावनाओं का स्वीकार श्रीराम चंद्रजी ने किया.  हमारे विचारों कि ऊर्जा हमारे हर कर्मेंद्रियों सेऔर अब तक पोहोचती है.मान लो रात के दस बजे जब हम ने किचन समेट  लिया है , उसी समय पर अचानक आपके घर मेहमान आ जाए तो उन्हे देख आपको खुशी होगी या पहिले संकल्प आयेगा "ये भी कोई बात है, फोन करके आ जाते अभी उनके लिये भोजन बनाना पडेगा"संकल्प मे ये भावना है परंतु हम उनको मन मे दबाकर चेहरे पर मिठी मुस्कान लाकर कहते है "अरे आप आये बहुत खुशी हुई" हमारे चेहरे के भाव और मन की भावना ये दोनो मे विरोधाभास होता है लेकिन सामनेवाले तक चेहरे के भाव नाही परंतु मन की भावना पोहोचती है. हमने न्यूटन का law सुना है every action has equal and opposite reaction ये सिर्फ कर्म के लिये नही परंतु हमारे संकल्प के लिए भी है.
मन विचार करने का कार्य करता है जिसे संकल्पशक्ती कहते है.परंतु हम उन संकल्प में अलग अलग भावना ये भरते है. जैसे कोई भी पदार्थ बनाते है वह बिना मसाले का हो तो का मजा नही आता. जिस प्रकार का मसाला है ऊसी अनुसर स्वाद आता है. ऐसे ही संकल्पो मे भावनाओं का मसाला भरा जाता है तब कर्म दिखाई देते है. शुभ ,अशुभ, नफरत, द्वेष, प्रेम , करुणा.......अलग अलग भावना ये है .जैसी भावनाये वैसा व्यवहार  दिखाई देता है.
अगर भावना शुद्ध और शुभ है तो बिना बोले भी व्यक्ती तक भावना पोहचती है .अगर कोई अलग भावना हो तो भले कितने भी मिठे बोल हो परंतु वो बोल मन को छुते नही है मान लो अगर किसी भूल पर हमे कोई डाट भी दे तो उसके पीछे की उनकी कल्याण की भावना, शुभ भावना मन को  छु जाती है
कही लोग पूछते है कि हम किसी के लिये कितना समय अच्छा सोचे कुछ समय तक let go करते है परंतु कभी गलत व्यवहार देखने के बाद व्यक्ति के लिए अच्छा या शुभ सोचना मुश्किल लगता है .बबात सही है मगर हम कोई भी बीज बोते है तो लगातार कुछ दिनों तक उसे पानी देते है अगर उसका ध्यान न रखे तो पोधा सुख जाता है या फिर मर जाता है .ऐसेही हम किसी मे परिवर्तन देखना चाहते है तो हमे अपनी भावना ऊ पर ध्यान रखना चाहिए लगातार कुछ दिनों तक व्यक्ती कोई भी बातो को देखते,सुनते हुए, नजर अंदाज करते हुए अपनी भावनाओं को शुद्ध रखने पर ध्यान दे. यही हमारा परिवर्तन व्यक्ति को भी परिवर्तन कर देगा
हमारी भावना गंध की तरह है. शुभ भावना  सुगंध है तो अशुभ भावना दुर्गंध है. जैसा गंध हमने अपने आपको लगाया है वही गंध जहा हम जायेंगे औरोको मिल जायेगा हर किसी को एक जैसा मिलेगा इसलिये त्योहारों या किसी days पर हम सिर्फ wish न करे परंतु हरपल हर किसी के लिये शुभ भावना रखे मुख्य बात तो ये है की शुभभावना रखने से हम खुद भी हलके, शांत रहते है. हमारा मन प्रफुल्लित रहता है. शुभ भावनाये रखने का फायदा ओरों को बाद में परंतु हमे पेहले होता है.
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कर्म-सिध्दांत

ढाई अक्षर का शब्द ‘कर्म’ अपने भीतर बहुत ही असाधारण अर्थ समेटे हुए है | सामान्य बोलचाल की भाषा में हर क्रिया जैसे चलना, बोलना, हँसना को कर्म कहा जाता है किंतु ज्यों-ज्यों हम गहरे उतरेंगे, कर्म का क्षेत्र उतना ही विस्तृत होता जाएगा |

कर्म के कानून में कोई अपवाद नही

समस्त विश्व कर्म के अटल नियम के अनुसार चल रहा है | कर्म-कानून के सामने आमीर-गरीब, काले-गोरे का कोई भेद नहीं| सभी को समान और सही न्याय दिलाने वाले इस कानून में कोई अपवाद हो नहीं सकता | ‘जैसा कर्म करोगे वैसा फल पाओगे’ इस सिध्दांत के अनुसार हर एक को सुख या दुःख प्राप्त हो रहा है| बिना कारण किसी को सुख दुःख की प्राप्ति नहीं होती| जैसे कैमरा आकृति को, रेडियो ध्वनी को और मैगनेट लोहे को अपनी ओर खीच लेता है वैसे ही राग-द्वेष से युक्त आत्मा भी गलत कर्म की ओर खींची चली जाती है| “अच्छे कर्मो का फल अच्छा और बुरे कर्मो का फल बुरा” इस बात को जिसने अपने मन पर अंकित किया है वह परिस्थिति का सामना बुद्धिबल तथा मन की स्थिरता से सहज ही कर लेता है| किसी व्यक्ति, साधन, वातावरण को दोषी न बनाकर उसका जिम्मेवार खुद को ठहराकर शांत हो जाता है|

कर्ता-भोक्ता आत्मा ही है

कर्म-सिध्दांत हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है| सही-गलत, सुख-दुःख की पहचान कराता है| कई महान विभूतियों ने कर्म- सिध्दांत की गरिमा को पहचाना और जीवन पथ पर अग्रसर होने का उपाय बताया की ‘कर्म करते चलो फल की अपेक्षा न रखो| कर्म का फल स्वत: ही हर किसी को प्राप्त हो जायेगा|’ गीता में वर्णित कई श्लोक हमें कर्म की गुह्यता का प्रमाण देते है और अशुभ कर्म से निवृत्त होते की शक्ति प्रदान करते है| व्यावहारिक जीवन में हर कदम पर कर्म- सिध्दांत के अनुसार सावधानी रखकर चले तो मनुष्य बहुत अंशो में पाप-कर्मो से बच सकता है| कर्म का कर्ता और भोक्ता स्वयं आत्मा ही है| कर्म एक बचे के सामान है | कर्म रूपी बालक संकल्प रूपी गर्भ में पलता है| सही समय, शक्ति और वातावरण प्राप्त होते ही वह जन्म ले लेता है| इसके जन्म लेते ही आत्मा को भी समय, शक्ति, साधन इसपर खर्च करने पड़ते है, भले ही कर्म नामक बच्चा अच्छा हो या बुरा|

कर्म रूपी बीज कभी निष्फल नहीं जाता

आत्मा अपनी भावना, धारणा और संकल्प अनुसार कर्म करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन हर क्रिया की प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया की पुन: क्रिया – यह प्रक्रिया आत्मा को कर्मबंधन में बांध देती है | जैसे मकड़ी बहुत सुन्दर जाल बनाती है और  खुद फँस जाती है वैसे ही आत्मा भी इस कर्मजाल में फँस जाती है| क्रिया तो समाप्त हो जाती है लेकिन प्रतिक्रिया दीर्घकाल तक मनुष्य के जीवन पर प्रभाव छोड़ देती है | इसलिए कहते है, ‘सोच समझ कर कर्म करो |’ कर्म एक बीज के समान है, वह कभी निष्फल हो नही सकता| आत्मा के व्दारा बोए गए हर कर्म का प्रतिफल उसे अवश्य प्राप्त होता है| भले ही वह आज मिले, इस जन्म में मिले या फिर कई जन्मो के बाद मिले, मिलता जरुर है| जैसे गाय का बछड़ा हजारो गयो में अपनी माँ को ढूंढ लेता है वैसे ही कर्मरूपी बच्चा भी अपने जन्मदाता को खोज ही लेता है| कर्म व्यक्ति की परछाई के समान साथ चलता है और समय आने पर सुख-दुःख रूपी फल देता है|

परमात्मा पिता की पवित्र किरणे जला देती है विकार्मो को

आत्मा स्वभावतः शांत, पवित्र और सतोगुणी है लेकिन देहभान  में आकर, विकृति के संग में आकर मैली हो जाती है| विकार्मो की परत आने से वह अपने मूल स्वभाव को त्याग विकारी बन जाती है | विकारो से युक्त आत्मा कर्मबन्धनों को काटने की बजाय और ही नए-नए बंधन बांध लेती है| कर्मबन्धनों से मुक्त होने के लिए आत्मो को परमात्मा से प्यार भरा सम्बन्ध जोड़ कर उनकी असीम शक्तियों को अपने अन्दर समाना आवश्यक है| जैसे सूर्य की किरणे वायुमण्डल की अशुद्धि को खत्म कर देती है साथ-साथ अपनी शक्तियों से कई चीजो को भरपूर कर देती है उसी अनुसार परमात्मा की पवित्र किरणे ज्यों- ज्यों आत्मा पर पड़ती है, आत्मा के अन्दर के विकारी कीटाणु खत्म हो जाते है और आत्मा सर्व शक्तियों से भरपूर हो जाती है| अपने गुण, शक्तियों की पहचान और परमात्मा से बुद्धियोग आत्मा को कर्मबन्धनों से मुक्त कर देता है|

पुन्य कर्म की कुल्हाड़ी से आत्मा कुकर्मो को काट सकती है| पुण्य कर्म के समझ और उससे प्राप्त होने वाली उर्जा आत्मा को जीवनपथ पर आगे बढ़ाने का साधन बन जाती है | कर्मफल की इच्छा ना कर अगर मनुष्य ‘नेकी कर दरिया में दाल’ इस सूत्र पर आरुढ़ हो जाये तो जीवन बहुत सुखदाई और मनोरंजक हो सकता है|

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