अपनों के साथ शतरंज न खेले

      बचपन मे हर एक को खेलना अच्छा लगता है| बाल्यावस्था से वृद्ध अवस्था तक हर एक को कोई न कोई खेल खलेना या देखना पसंद होता है| क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल से लेकर शतरंज, ताश कई खेल हम खेलते है, उसका मजा लेते है| कुछ खेल कई मिलकर खेलते है तो कई एक दुसरे मे खेले जाते है| खेल कोई भी हो लेकिन हार-जीत, लाभ-हानी यह तो होता ही है| एक जीतता है तो दूसरा हारता है| हमेशा एक ही जीते ऐसा नही, कभी हार तो कभी जीत होती रहती है| जो भी खेल का परिणाम हो उसे सहर्ष स्वीकार करना समझदारी है| परंतु कई बार ये भी देखते है की खेलते-खेलते कई खिलाडी आपस मे ईर्ष्या करना या बदला लेने की चाहना रखते है| खेल के नियमों को तोडकर बदला लेते है| ऐसी कई बाते होते हुए हम देखते है|

    ‘LIFE IS A GAME’ हमारे जीवन मे भी वही होता है| वास्तव मे परिस्थितीया एक खेल है| हमे उसे खेल समझकर खलेना है न की जिस व्यक्ति से परिस्थिती आई है उसके साथ नफरत या बदले की भावना रखते  है| लेकिन व्यावहारिक जीवन मे आज हमसे ये गलती   कही ना कही हो जाती है| इस जीवन के खेल का नियम है ‘जो जैसा करेगा उसे वैसा मिलेगा’| इस नियम को भूल हम उनसे बदला लेना, गुस्सा करना, नफरत करना शुरु करते है और यह सब करना सही भी समझते है| आज किसीको धोके मे रखना, धोका देना यह तो बिल्कुल साधारण सी बात हुई है| और ये सारे खेल जो हमारे बहुत निकट के है, जिन के अंग संग रते है उन्ही के साथ खेलते है| इसलिए आज के संबंध जटिल बनते जा रहे है| पती-पत्नी, बालक-पालक, मित्र-संबंधी ये सारे संबंध सुख देने-लेने के लिए बने है, दुःखों मे साथ निभाने के लिए है लेकिन आज इन्ही संबंधो मे हम धोका देते है| अपनो के साथ ही शतरंज खेलते है|

     आज कल विज्ञान ने कई प्रभावी साधन दिए है जिससे  हम संबंधो को मजबूत और गहरा बना सकते है| लेकिन उसका इस्तमाल हम गलत तरीके से करते है| facebook से हम कई मित्र बना लेते है| लेकिन अपनी सही पहचान न देकर झुठ, कपट करते है| दुसरे नाम से अपनो के साथ ही छल करते रहते है| रिश्तो मे विश्वास बढाने के बजाए और ही रिश्तो से विश्वास उठता जा  रहा है| इसलिए कहते है इन्सान को पहचानना बडा मुश्किल है| जो ऐसे दुसरो के साथ खेल करते है वह तो उन बातो का मजा लेते है, सामनेवाले की भावनाओ के साथ खिलवाड करते है| मगर ‘आज मजा और कल सजा’ जरूर मिलती है| क्योकि इस जीवन का नियम है ‘जैसा करोगे वैसा पाओगे’| भले किसी को सही रूप से पहचाने मे समय लगता है लेकिन हमने जो उनका समय, संकल्प, शक्ति को गलत तरीके से नष्ट कीया, उसका भी तो कर्म का खाता बनता है| सुख देंगे तो सुख मिलेगा और दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा यह तो है ही लेकिन हमारे कारण किसी की भावनाओ को ठेच पहुचती है या मन दर्द का अनुभव करता है तो उसका भी रिटर्न हमारे पास आज नही तो कल आएगा| बोल से दुःख दिया तो बोल से ही दुःख मिलता है वैसे ही संकल्पो से दुःख दिया तो हमारा मन कभी खुशी का अनुभव नही कर सकता, मन उलझा हुआ रहेगा| इसलिए व्यक्तिओंके साथ ऐसा छल (खेल) न करे|

      यह जीवन खेल समझकर जरूर खेले अर्थात जब कोई बात आती है, तब उसे पार करने के लिए हम अपनी सारी शक्ति, बुद्धी लगाए| फिर उसके परिणाम को भी स्वीकार करे| आगे क्या करना है उसकी समझ बढाकर अब कैसे खलेना है उसे समझ ले| लेकिन किसी  व्यक्ति विशेष के लिए मन मे गांठ बांधकर न चले| वास्तव मे हमारी कश्मकश बुराईओ के साथ है न की व्यक्तिओं के साथ| हमने महाभारत मे भी देखा की खेल खेलते कहा रणभूमी तक पहुचे| एक दुसरे से बदला लेने के लिए आमने सामने आये| यह सारे दृष्टान्त हमारे जीवन से जुडे हूए है| अगर कुछ हारने की शक्ति नही है या खेल की समझ नही है तो ऐसे खेल से दूर रहे| अर्थात जीवन मे जो है, जैसा है उसे स्वीकार करके उसीमे गुजारा करे| अगर कुछ पाना है तो खेल मे उतरे| कभी हार या जीत हो उसे दिल से स्वीकार करना भी सिख ले |

      हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण है जिन्होने अपनी जीवन मे कई बार हारने का अनुभव कीया| लेकिन फिर भी उस हार से सिखकर आगे बढे| कोई वैज्ञानिक, |       व्यापारी, कलाकार, खिलाडी बने| हर मिश्किल परिस्थितीओं को पार करके दिखाया| अपने अपने क्षेत्र मे विशेष बनकर दिखाया लेकिन कर्मो मे झुठ, कपट, छल को नही अपनाया| उन्हे पता था अच्छा कर्म हमेशा मन को सुगून देता है और छल बैचैनी| जीवन का आनंद तब है जब अपनो के सामने हारकर उनकी जीत की खुशी मनाए|

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दृढता

वर्तमान समय हर मनुष्य समस्याओ के चक्रव्यूह मे घिरा हुआ दीखाई देता है| यह कोरोना काल जैसे परीक्षा काल बन गया है| इस समय आनेवाली नवनवीन समस्या हमारे अंदर की शक्तीयो को, गुणो को टटोल रही है| ऐसे मे सभी समस्याओ को शांती से पार करना एक चुनौती बन गयी है| अचानक नौकरी का इस्तिफा हाथ मे आ जाता है तब आगे जीवन मे क्या करे, कैसे करे, कहा जाये.. ऐसे कई सवाल खडे हो जाते है| लेकिन उस समय पर अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना , फिर से नई शुरुवात करना उसके लिए दृढता आवश्यक है| कोई भी प्रकार की समस्या हो या चुनौती हो उसको पार करने के लिए दृढता की जरूरत है| कुछ कर दीखाने का हौसला हो| कभी-कभी हम परिस्थितीयो के वार से थक जाते है, अपने आपसे ही पूछते है आखिर कब तक? लेकिन इसका जवाब है ‘ अंत तक ’| जब तक जीना है, परिस्थिती का सामना अंतिम सांसो तक करना है इसलिए अपनी दृढता को बनाए रखे|

दुनिया मे ऐसे कई लोग होकर गये जिन्होने जन्म से ही परिस्थितीयोको झेला लेकिन सभी के सामने एक उदाहरण बन गये, जैसे ‘जेसीका कॉक्स’| जिनको जन्म से ही दो हाथ नही थे लेकिन महिला पायलट के रूप मे जाना जाता है| उसके साथ कराटे, पियानो भी सीखे| वह कहते है की ‘मैने कभी ये नही सोचा की मुझे हाथ नही है तो क्या करू लेकिन जिनको हाथ है वो जो नही कर सकते वह सबकुछ कर दिखाऊ ये सोच रखी| हाथ न होने का गम कभी महसुस नही किया|’ वो अपने सारे कार्य दो पैरो के बल पर करते है| जन्म से ही कुछ कमीयो को लेकर आये लेकिन ऊन कमीयो पर मात कर के दिखायेगे यह दृढता आज उन्हे जीवन मे सफल होने का एहसास करा रहे है| इसलिए कहते है ‘दृढता सफलता की कुंजी है’| सारे बंद तालो को खोलने की चाबि है|

ईन्सान का जीवन ‘साप सिढी’ के खेल की तरह है| कब कोई कहा से उपर चढ जाता है और कब कोई कहा से नीचे गिर जाता पता ही नही चलता| लेकिन कितने भी उतार-चढाव आये फिर भी जीवन पथपर चलते रहने की दृढता जरूर हो| कोई समस्या आने के बाद अगर व्यर्थ की चिंता मे फॅस गये तो वह परिस्थिती हमे बहुत बडी लगने लगती है| लेकिन मन मे संकल्प किया की ‘कोई बात नही इसे भी पार कर लेंगे’ तो यह सोच ऑक्सीजन का काम करती है| रुकी हुए सांसे चलने लगती है| कयू, क्या, कैसे, कब, कहा यह सारे सवाल हमारी उम्मीदो की सांसो को रोक लेते है| इसलिए सर्वप्रथम हम अपने मन को शांत रखे| क्युकी शांत मन हर समस्या का समाधान दिलाता है| जैसे पानी जितना स्थिर और स्वच्छ होता है उसके अंदर की हर चीज स्पष्ट दिखाई देती है वैसे ही हमारा मन अगर स्थिर और विचार शुद्ध, सकारात्मक है तो हर उलझन का उपाय दीखाई देता है, सही राह मिल जाती है| और सही राह पर चलने की दृढता हमारे मे है तो पहाड जैसी परिस्थिती को भी सहज पार कर सकते है| इसलिए विजयी होना है तो दृढता को बनाए रखे|

निरंतरता और दृढता यह सफलता पाने के दो आधार है| जैसे नवरात्रि मे कोई नौ दिन उपवास करते है, कोई एक दिन ही कर पाता है| जिन्होने लक्ष तक पहूचने का पक्का संकल्प किया हो वही दृढता से कर पाते है| जीवन मे भी तन की स्वस्थता के लिए व्यायाम करना हो या गलत आदतो को मिटाना हो या कुछ पाने के लिए की गयी मेहनत हो हर एक को बरकरार रखने के लिए दृढता का होना जरूरी है|

‘कुछ कर दिखायेगे’ यह दृढ संकल्प हमे आगे बढाता है| हारे हुए ईन्सान को चालणे का सहारा देता है| इसलिए समस्याओंसे डरे नही| कभी निराशावादी न बने| मनुष्य जीवन एक परीक्षा हॉल है| यहा हर एक को हर प्रकार की परीक्षा देनी है| अपनी मंजिल पर समय पर पहुचना हो तो दृढता का हाथ पकडकर चलते चले|

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बदला नही लेना किसी से, बदल के हमको दिखाना है

‘बचपन के दिन भूला न देना, आज हसे कल रूला न देना..’ भले हम कितने भी बडे हो जाये लेकिन बचपन के दिन भुला नही पाते, हसने और रोने के दिन| छोटेपन मे जब खेलने जाते थे और कभी किसी से हातापायी होती थी, रोते हुए घर आते थे तो कहते थे की कभी किसी का मार खाके नही आना | मार खाना माना कमजोर| कभी कमजोर नही रहना| ऐसी शिक्षाए अकसर मिलती थी| सामनेवाले को सबक सिखाना माना बहादुरी ऐसा हम सभी का मानना है| ‘tit for tat’, तभी समझ नही थी| वो बाते सही लगती थी| लेकिन आज जब कर्मो के गहरे राज समझ रहे है तब वो बाते गलत लग रही है| हम समाज मे भी ज्यादातर ऐसे लोग देखते है जो इट का जवाब पत्थर से देना जानते है| लेकिन ऐसे भी लोग दुनिया मे है जिन्होने पत्थर का जवाब फूल से दिया है|

     एक सत्य घटना हमारे सामने है| एक मुस्लिम महिला जिसका नाम रुकिरा है| उसका बेटा सुलेमान जब चौदा साल का था तब किसी बच्चे ने चंद रुपयो और अन्न के लिए उसका खून कर दिया| खूनी बच्चे की उम्र सिर्फ ८ साल की थी| रुकिरा को अपने बच्चे के खून का बहुत दुःख हुआ| लेकिन उसने उस बच्चे को माफ कीया| उसको १४ साल की कैद भी हुई लेकिन उस दौरान वह उस बच्चे से मिलने भी जाती थी| जब वह बच्चा जेल से बाहर निकला तब उसने उसे अपना बच्चा बना लिया| आज वह दोनो आमने सामने रहते है| कहने का भाव यह की गलत कर्मो की सजा हम किसी को क्या दे? लेकिन ईश्वर ने हमेशा क्षमा करना सीखाया है| क्या हम किसीकी गलती को जल्दी माफ कर पाते है? बडी बाते तो छोडो लेकिन छोटी छोटी बातो का भी बदला लेने की चाहना रखते है| मन मे उसी तरह के ख्यालात रखते है| अपने को भी वही समझाते है की ‘यह बात तो सही है की कोई मेरा नुकसान करे तो मुझे भी उसके साथ वैसा ही करना चाहिये| हम साधारण मनुष्य है, महान नही’| ऐसे सोचकर हम गलत कर्म करने की छुट्टि दे देते है| लेकिन सही कर्म करने की शक्ति नही रखते|

     कभी सोचकर देखे की कोई हमारे साथ ऐसा व्यवहार कयू करता है? शायद कभी हमने भी उससे वैसा वर्तन कीया होगा| आज वह लौटा रहा है तो हमे वह मंजूर नही| हम सिर्फ वर्तमान को देख वैसा कर्म कर लेते है| मगर सच तो यह है की कर्म का हिसाब तो कई जन्मो का है| जब तक वह चूक्त नही करते तब तक वह हमारे सामने रूप बदल कर आते रहेंगे| इसलिए समझदारी इसीमे है की उसे जल्दि चूक्त कर रवाना करे| यह गुह्य राज है की ‘ कोई तब तक आपको दुःखी या नुकसान करेगा, जितना आपने उसका कीया है’ लेकिन इस बात की जानकारी न होने के कारण हम आज ‘tit for tat’ के अनुसार चल रहे है| खुद भी दुःखी और औरों को भी दुःखी करते रहते है|

     जब ऐसे कोई कर्म बंधन सामने आये तो कुछ समय अर्थात जब तक परिस्थिती थंडी न हो तब तक मौन रखना, दूरी बनाए रखना यह समझदारी है न की उनसे उलझना| हम जितना हो सके react न करे| क्योकि react करने से वह दुःख की लेन-देन और बढती रहेगी| ये कर्मबंधन अर्थात ही किसी आत्मा से लिया हुआ कर्ज जो उसे लौटाना पडता है| ये कर्ज सुख और दुःख दोनो का होता है| ‘ जो हम देंगे वही हम पायेंगे’ यह कर्म का नियम है| सुख देंगे तो सुख मिलेगा, दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा| हमने औरों को क्या दिया वह हमे याद भी नही रहता परंतु जब बाते सामने आती है तो इस नियम को भूल जाते है|

      इसलिए हमे धैर्यता और समझदारी से इस राह पर चलना है क्योकि आखिर हर एक को अपने साथ अपने कर्मो को ही लेकर जाना है| बदला लेंगे तो सामनेवाला भी वही हमारे साथ कारेगा| लेकिन अगर हम बदलकर दिखायेंगे तो अन्य को भी बदलने की प्रेरणा मिलेगी और हम भी कर्म बंधनो से मुक्त हो जाएंगे|

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दिपावली मनाए नई सोच के साथ

भारत ही एक ऐसा देश है जहा त्योहारो की शृंखला चलती है| गणेशोत्सव, नवरात्रि उत्सव और फिर दिपावली लेकिन दिपावली का महत्व कुछ और है| जिसका इंतजार बच्चे-बुढे सबको रहता है| कई दिनो पहले से सब उसकी तयारी मे लग जाते है| सफाई, नये वस्त्र, नई चीजे, मिठाईया .. हर घर मे दिये जलाकर रोशनी की जाती है| पुरा माहोल उमंग, उत्साह से भर जाता है| वर्तमान समय हम जिस दौर से गुजर रहे है उसमे कुछ सावधानिया बरतनी पड रही है लेकिन फिर भी हम दिपावली का त्योहार मास्क पहनकर, दुरिया बनाकर भी मना रहे है|

जैसे आज मास्क, सोशल distancing, sanitase करना जरूरी है वैसे आज दिपावली हम नये अंदाज के साथ मनाये| त्योहारो मे नये कपडे पहनते है उसी तरह नये तरीको को अपनाकर चले| korona के कारण मुह पर मास्क लगाना अनिवार्य है| कईयो ने उस मास्क को भी fashion का रूप दे दिया है| जैसा ड्रेस वैसा मास्क| क्या हम जैसा समय वैसी सोच बनाकर चल सकते है? क्या कम बोलकर समस्या को कम कर सकते है? मुह पर पट्टी बांध लेना माना व्यर्थ, नकारात्मक बोल को पट्टी लगाना| कहते है ‘चूप रहने मे सों गुण’| इसलिए समय भी हमे चूप रहना सिखा रहा है| आज हम सभी को ‘ Happy New Year ’ का massege भेज रहे है, शुभ कामनाए दे रहे है लेकिन साथ साथ नई सोच भी रखे| दिपावली माना पुराना खाता खत्म और नया शुरू | हम व्यवहार मे भी इस बात को लाये| पुरानी यादे, बाते, गलत अनुभव ऊनको delete करते जाये| आज तक जो react करने का तरीका रहा उनको आज से बदल दे| तभी कह सकते है नया साल| पुरानी बातो को लेकर नया साल कैसे मना सकते है?

दुसरी बात social distancing रखते है जिससे सामनेवाली की सेहत का हमपर असर ना हो, वातावरण मे फैले हुए gems हावी ना हो| आज कोई रुठ जाता है, नाराज होता है, गुस्सा करता है तो उसका असर जरूर हमपर होता है और हम भी वैसे ही करने लग जाते है| या कोई हसकार बात करे हो हम वैसे कर लेते है| अर्थात परिस्थिती का प्रभाव पडता है| उस प्रभाव से बचने के लिए हम ‘थोडीसी दूरी है जरूरी’ इसको समझे| विचारो की भिन्नता होते हुए भी सबको अपना कर चलना| आज बार बार हाथ धोने के लिए इशारा दिया जा रहा है, हम अपने मन पर लगने वाले कुविचारो के मैल को भी बार बार धोते रहे जिससे हमारी मानसिकता अच्छी रहे| शरीर की immune को बढाने से सदा सेफ रह सकते है वैसे ही हम अपनी मन की immune को बढाने के लिए रोज शुद्ध विचाऱ्ओंका सेवन करे| आज हम नये साल की शुरुवात नई सोच के साथ करे| रोज सुबह एक समर्थ, सकारात्मक सोच को मन मे लाये और पुरा दिन उस विचार को दोहराये| आप अनुभव करेंगे की सोच से हमारी कार्य प्रणाली भी फास्ट हो जाती है | इससे हमारा तन और मन दोनो सुरक्षित रह सकते है|

तो आईए, समय के परिवर्तन के साथ अपनी सोच को बदलकर जीवन को नये अंदाज के साथ जीकर देखे| नई सोच, नया तरीका ही जीवन मे उमंग भर देता है| और “जहा उत्साह है वहा उत्सव है”| नाही तो उत्सव होते हुए भी दुखी हो जाएंगे| चलो इस बार हम दिपावली का त्योहार कुछ स्थूल सावधानीयो  को ध्यान पे रखते हुएमन को शक्तिशाली बनाकर मनाए|

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मन को अपना मित्र बनाये

आज मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से बहुत कुछ हासिल किया है| कुछ सालो पहले जो बाते असंभव लगती थी, वह आज सबकुछ नजरो के सामने प्रत्यक्ष हो रहा है| बचपन में दूर बैठे इन्सान को अपनी मन की भावनाए पहुचाने के लिए पत्र, तार भेजते थे| उनसा जवाब कब आएगा उसका इंतजार करना पड़ता था| विदेश में रहनेवालों के लिए तो और ही राहे तकनी पड़ती थी| लेकिन आज विज्ञान ने कहा पर भी बैठे हुए रिश्ते तक अपनी भावनाए १ सेकेंड में पहुचाने वाले साधन बनाकर दिए है| लोगोंसे बात करना, किसी को ढूंढना, रिश्ते बनाना बहुत आसन हुआ है| बाहर की और मनुष्य प्रगत हो रहा है लेकिन अन्दर की और उतना ही खाली| अपनोंसे, अन्जानोसे बात करना जितना आसान उतना खुद से बात करना मुश्किल लग रहा है| अपने से दुरी बढती जा रही है| इसी दुरी के कारण मनुष्य सुख-शांति से भी दूर होता जा रहा है|

        किसी को भी हम पूछते है की जीवन में क्या चाहिए? तो जरुर यही जवाब मिलता है की ‘सुख-शान्ति चाहिए’, वो कहा और कैसे मिलेगी इसकी खोज में इन्सान भटक रहा है| कभी मंदिर,जंगल, बगीचा, पहाड़, सागर का किनारा, गुफा… कितनी जगहपर ढूंढ लिया लेकिन अपने उंदर जाकर ढूंढने की समझ किसीने नहीं दी|हर चीज बाहर खोजी, किसी से मांगी मगर यह ऐसी चीजे है की किसी स्थान पर न मिल सकती है न कोई दे सकता है| हमें जो चाहिए वह सबकुछ अपने अन्दर ही मिल जायेगा| वह पाने के लिए मन की अपना मित्र बनाने की आवश्यकता है|

       वर्तमान समय छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग इन्सान तक हर किसी को friends बनाना अच्छा लगता है| facebook, whatsapp, twitter…. इनसे हम अनजान व्यक्तिओंसे रिश्ते बना रहे है लेकिन खेद की बात तो यह है की हम अपने मन को मित्र नहीं बनाने में असफल हो रहे है| मन को तो पूरा दिन इधर से उधर भटकते रहते है| जिसके साथ बैठकर बात करने से हर कार्य संभव हो सकते है, छिपी हुए शक्तियों के खजाने मिल सकते है, प्रगति के सरे द्वार खुल सकते है…. उसको मित्र बनाने के बजाय हम इन्सान को मित्र बनाकर अपना समय, शक्ति… कितना कुछ व्यर्थ गवाते है| मन लो किसी व्यक्ति से मित्रता करते है लेकिन उससे कोंसी बातचीत करते है? इसलिए अगर हमें सुख-शान्ति का अनुभव करना है तो सर्वप्रथम अपने लिए समय निकाले|

        हमारा मन बहुत आज्ञाकारी है| वह हमें कई बाते accurate बताता है| आपने अनुभव किया होगा की रात को जिस सोच को लेकर आप सोये हो, आँख खोलते है तो पहले वही सोच आ जाती है| जैसे mobile में कोई app खोलकर उसे पूरा बन्द न किया हो तो जब उसे खोलते है तो पहले वाली चीज आपको दिखाई जाती है वैसे ही मन हमें रोज बताता है की आप किन विचारो को लेकर सोये थे| अगर वह विचार व्यर्थ, नकारात्मक, तनाव या दुःख से भरे हे तो आँख खोलने के बाद उन्ही विचारोंसे शुरुवात होती है| इसलिए मन को व्यर्थ दिशाओं में दौड़ाने के बजे उसे सही रह पर लेकर आये| मन में व्यर्थ विचार उठते हो तो सकारात्मक, श्रेष्ठ विचार देने की प्रैक्टिस करे| बार-बार उसे व्यर्थ से समर्थ की और लेकर आए क्योकि व्यर्थ सोचने की आदत भी तो उसे हमने ही डाली है|

       जैसे किसीको रोज चटपटा खाने की आदत पद जाये तो बिना मिर्च मसालेवाले पदार्थ अच्छे  नहीं लगते वैसे ही शुरुवात में अच्छे विचार करना boiring लग सकता है मगर उसी से हमारे मन की सेहत अच्छी बनेगी| मन लो आपके मित्र को शराब पीने की लत लग गयी हो तो  बार बार उसके कदम किस और जायेंगे? वैसे ही इस मित्र को तनाव, दुःख, उदासी…. बारे विचारों की आदत पडी है, उसे प्यार से, धीरज से सही रस्ते पर लाना है| दिन में कुछ ऐसे कार्य होते है जहा हमें बहुत ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं होती| जैसे स्नान करना, चाय पीना, पैदल करना…. उस समय पर जागरूकता से मन में श्रेष्ठ विचार लाये| मै बहुत खुश हु, जो भी मुझे मिला है उसके लिए मै भगवन का शुक्रगुजार हु, सबकुछ अच्छा है, हर बात में कल्याण है….ऐसी सोच रखने से हमें खुद को अच्छा लगेगा| विचार शांत होने लगेंगे| धीरे-धीरे उलझाने समाप्त होने लगेगी| इसलिए इस मन मित्र के साथ बात करने में समय बिताये| अगर वह आपको साथ देना शुरू करे तो दुनिया की कोई व्यक्ति, हालाते, समस्याए आपको हिला नहीं सकती| यह दोस्त ऐसा है की आपको हर पल, हर परिस्थिति में साथ देगा| सिर्फ ये ध्यान दे| उसके साथ प्यार भरी बाते करे| अपने लिए, इस दोस्त के लिए समय निकाले | इसलिए कहते है ‘ मन जीते जगतजीत ’| इसको अपना बनाया तो सारा जग अपना लगने लगेगा| इसपर जीत पायी तो सारे जहाँ को जीतने की समर्थि आपमें आएगी

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फुलस्टॉप

बचपन में मात-पिता से लेकर टीचर तक हर कोई बोलना, लिखना, चीजों के नाम पहचानना …….. सब सिखाते है और कितना हमें सही आता है उसकी test लेते है | जब हाथ में पेन्सिल पकड़ना भी ठीक से नहीं आता था, तब हम पहले उस पेन्सिल की नोक से बिन्दी लगाना अर्थात विराम (fullstop) की मात्रा लगाते थे | जैसे बड़े होते गए, समझदार अपने आप को कहलाने लगे | उतने ही जीवन के हर दृष्योंको देख सवाल पूछना सीख गए | मन चाहा जबाब नहीं मिलता तब तक सवाल पूछते रहे | कभी अपने से तो कभी औरों से | स्कूल लाइफ में जो मात्रा लिखने में सब से टेढ़ी बाकी लगती थी , मुश्किल लगती थी वो आज सहज लगती है | लेकिन जब कुछ लिखना भी नहीं आता था तब जो मात्रा सहज लगती थी वही मात्रा आज बहुत ही कठिन महसूस होती है |

आज के इस आधुनिक युग में विज्ञान ने मनुष्य को बहुत सारे साधन निर्माण करके दिए है | और नई खोजे करने में वह लगा हुआ है | कोई भी खोज करते समय उस बात को लेकर कई अलग सवाल निर्माण कर उसकी खोज करते रहते है | सवालों में उलझने की जैसे आदत सी पड़ी है | विचारों की गति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है | जैसे रोजमर्रा के जीवन में मनुष्य हर कार्य में अपनी गति को बढ़ाना पसंद करता है | गाड़ी fast चलाने में मजा आता है अगर मान लो कोई धीमी गति से चलता है तो उसे ‘थोड़ा तेज चला’ ऐसा कह देते है वैसे ही हमारी सोच भी fast हो रही है | इसको ब्रेक लगाना आज इन्सान को मुश्किल लग रहा है | अपनी ही सोच से परेशान होते जा रहे है | आपने देखा होगा जब इन्सान गुस्से में, बदले की भावना, तनाव, ईर्ष्या ……… के वश होता है तब उसके विचारों की गति बढ़ती है, वही अगर अच्छा सोचना शुरू करो तो गति धीमी हो जाती है | हमें अपनी नकारात्मक सोच को अगर stop करना है, तो हमें अच्छा सोचने की आदत डालनी होगी |

जीवन को नई दिशा देनी हो तो पुरानी बातों को फुलस्टॉप लगाते है | स्कूल लाइफ में जब निबंध (essay) लिखने के लिए कहते थे, तब उसके रुख को बदलने के लिए विराम का चिन्ह लगाते थे | आज वही विराम जिंदगी में लगाने की मेहनत करनी पड़ रही है | पुरानी बातें, पुरानी घटनाएं , पुराने अनुभव उनसे अच्छा लेकर जो ‘ बिता उसे बिंदी लगानी है ’| बिता हुआ कल जिसे भूतकाल कहते है, जब भी उसे याद करो तो वह भूत के समान वह डरावना लगता है, दर्दनाक लगता है | ऐसी बातों को याद कर हम अपने आज को न बिगाड़े | पुरानी बातों को fullstop लगाने के लिए मन शक्तिशाली होना जरुरी है | कमजोर मन व्यर्थ के विस्तार में जाएगा | लेकिन शक्तिशाली मन बातों को मोड़ने की ताकत रखेगा | जिंदगी के हर पड़ाव को पार करना है तो रास्ते में आई हुई हर बातों को पार करना सीखे | आज के, अभी के पल को जीकर देखे तो कल आपे ही सवर जाएगा |

छोटी सी जिंदगी में बहुत कुछ करना बाकी है | इसे व्यर्थ की बातों में न बिताए | इसे ख़ूबसूरत बनाने के लिए सूंदर विचारों को अपने मन में बटोर ले | ऐसे लम्हे अपनी स्मृति में रखे जिन्हे कभी भी याद करे तब सुख की सुगंध महक जाए | बुरी बातों को fullstop लगाकर नयी सोच रख जीवन को नयी दिशा दे |

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जागते रहो

बचपन में गांव में या शहरों में रात के समय पर पहरेदार आवाज लगाते थे ‘जागते रहो’ |  कई बार मन में सवाल उठता था कि  रात का समय है, सोने का समय है फिर ये क्यू कहते है कि जागते रहो ?  लेकिन न वह बात समझ में आती थी, ना कभी किसी से पूछा |  लेकिन आज उसका अर्थ समझ रहे है कि दिन हो या रात हम सभी को इस समय पर जागृत रहना कितना जरुरी है | भक्तिमार्ग में गणपति या नवरात्रि के दिनों में जागरण करते है |  रात जाग कर निकालते है |   कई उसमें  भगवान के भजन किर्तन गाते है, प्रवचन सुनते है, तो कई ताश खेलते हुए भी नजर आते है |  इस ‘जागरण’ या ‘जागते रहो’ का अर्थ क्या है ?

एक वक्त था जब इन्सान को गलत कर्म जैसे चोरी, खून, बलात्कार। ……..  करना होता था तो रात को करते थे |   समझते थे किसी को पता नहीं चलेगा कि इस अंधेरे में ये काम किस ने किया है |  लेकिन आज सारे गलत कर्म दिन दहाड़े भी होते है | कहते है ये कलयुग रात है अर्थात ही ये पूरा ही रात्रि का समय है जिस में कुकर्म की प्रेरणा मनुष्य के मन में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है |  एक है अज्ञानता का अंध:कार , जिसमें मनुष्य सही राह कि तलाश में है | जीवन में बढ़ती समस्याओं के बीच सही निर्णय लेने की क्षमता वह खो बैठा है |  ज्ञान की रोशनी का एक किरण भी मिल जाए, उसकी खोज में भटक रहा है |   शास्त्रों के पन्नों को पलटकर देखा, गुरुओं के प्रवचन को सुनकर देखा, कई कर्मकांड भी किए परंतु वो खोज सफल नहीं हुई |   ऐसा सुख-शांति, प्यार के लिए भटकता हुआ मानव देख रहे है तो दूसरी ओर  मोह, लालच, नफ़रत की आग में जलता हुआ मानव विकारों के कारण खुद की तथा दूसरों की तबाही करता हुआ नजर आ रहा है |

बचपन में भूतों की कहानी सुनते थे तब एक चीज कॉमन होती थी जिस में रात में भूतों का प्रभाव बताया जाता था |   आज हम मनुष्य की वृत्ती में बसे हुए काम, क्रोध जैसे विकारों के किस्से सुनते है |   हिंसक वृत्तीयों को बढ़ता देखते है |   ऐसे समय पर सतर्क रहना आवश्यक है |  किसी की गलत वृत्ती का शिकार हम तो नहीं हो रहे ?  या मेरी ही कोई गलत मनोधारणा से किसी का नुकसान तो नहीं हो रहा ?  इसलिए ‘जागते रहो’ का मंत्र याद रखना है |  जैसे अंधेरे में एक-एक कदम संभल-संभलकर रखते है वैसे मुझे इस दुनिया में हर कर्म संभलकर करना है |  जागृत होकर चलना है |  हम घर में तो रोशनी करते है परंतु घर के बाहर भी प्रकाश हो इसका ध्यान देते है वैसे ही मेरे अंदर कोई भूत जन्म तो नहीं ले रहा ?  गुस्सा, ईर्ष्या, स्पर्धात्मक वृत्ती, कामुकवृत्ती बढ़ तो नहीं रही इस पर तो ध्यान देना ही है |   ज्ञान का दीपक पहले मेरे मन में जलाना है फिर बाह्य विश्व में भी यह बढ़ रही है लेकिन इसमें में कैसे सुरक्षित रहूँ इस पर भी ध्यान हो जिस को ही सच्चा जागरण कह सकते है |

वर्तमान समय रात को भी दिन बनाने की विज्ञान की शक्ति हम देख रहे है परंतु  सच्चा सुख किस में है, सफलता या सच्ची प्राप्ति किसे कहेंगे, कौनसी दौड़ को जीतना चाहिए ऐसे कई सारे सवालों के जवाब देनेवाले ज्ञान की रोशनी मनुष्य के पास नहीं है इसलिए आज भी भौतिकता में फॅसा हुआ मानव ठोकरे खा रहा है |  गलत पथ पर जा रहा है |  इस मायावी नगरी में भूले करता जा रहा है इसलिए जागृत रहना है |  न हम से भूले हो, न किसी को भूले करने देना है |  ज्ञान की सही राह पर चलना है |  ऐसे भी शायद हो सकता है कि इस समय पथपर चलने में हजारों मुश्किलें आए मगर सही दिशा में आगे बढ़ना है |

कहते भी है ‘सत्य का मार्ग बड़ा कठीन है’ इसलिए झूठ बोलना सहज लगता है |  जीवन में ऐसे कई शॉर्टकट लेते है लेकिन यही हमारे लिए मुश्किलों का जाल बनाते है |  छोटे-छोटे कर्मों में उलझकर आसान जिंदगी को कठीन बनाते है |   थोडासा जागरण हमें बेहतरीन पल दे सकता है इसलिए ‘जागते रहो’ |

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युवा बचाओ

वर्तमान समय एक ओर मनुष्य विकास की ओर आगे बढ़ते हुए नजर आ रहा है तो दुसरी ओर  जीवन में सामाजिक, आर्थिक, शारिरीक, मानसिक स्तर गिरते हुए दिखाई दे रहा है |   विज्ञान ने तो आज के युवा को विकास की इतनी दिशाए दिखाई है कि वह भ्रमित हो रहे है कि कहाँ जाए और क्या करे ?  एक वक्त था कि परिवार के सदस्य, पालक अपने बच्चों को सही पथ दिखाते थे परंतु आज वह भी समझ नही पा रहे है कि हमारे बच्चों को कौनसा मार्ग दिखाना चाहिए इसलिए विज्ञान ने उनको सल्लागार (councellor) भी दिए |   लेकिन फिर भी —–

आज हम अपने युवाओं को मानसिक रित्या बहुत कमजोर, व्यसनाधीन, दिशाहीन देख रहे है |   जीवन तो जी रहे है,  शिक्षा की नयी-नयी बातों को जल्दी से आत्मसात भी कर रहे है,  अच्छी Degree भी ले रहे है लेकिन संबंधो में आने वाले उतार-चढाव का सामना करना,  परिस्थितीयों  को समझकर सहन करना, निर्णय लेना—- इन बातों में कमियाँ दिखाई देती है |   आजकल हर चीज हमें instant मिलती है |  पदार्थ, पैसे, टिकट, सुविधाएं, मनोरंजन —— इसलिए कुछ समय रूककर समस्याओं के सही रूप को देखने का धीरज वह खो बैठे है | 

कुछ समय पहले भाईंदर की खाड़ी में एक युवक ने फाँसी लगाकर जीवघात (suicide) किए हुए कुछ फोटो देखे थे |   अंदर बार-बार सोच चल रही थी कि ऐसा क्या हुआ होगा, जो इतनी कम उम्र में जीवन को खत्म करने का ही एक पर्याय इसके पास था ?  कोई भी परिस्थिती का रूप हो, कोई अपने आप को ख़त्म करने का बल दिखा सकता है लेकिन उस परिस्थिती  का सामना नहीं कर सकता ?  वास्तव में यह कमजोर मन की निशानी है जो समस्या का समाधान सिर्फ अपने को ख़त्म करना समझते है | 

बचपन से बच्चे को ये सिखाया जाता है कि तुम्हारा दोष नहीं है, सामने वाला गलत है |  जैसे कोई बच्चा चलना सीख रहा है,  कभी-कभी वह चलते वक्त गिर जाता है, वह रोने लगता है तो माँ उसे चूप कराने के लिए आसपास अगर कोई व्यक्ति, टेबल, या कोई चीज हो उसे मारकर बताती है कि इसके कारण गिरे होना, इसे मैं मारती हु, तुम्हारा कोई दोष नही |   वह बच्चा भी यह सब देख रोना बंद कर देता है |   वही बच्चा बड़ा होने के बाद जिद्द करके अपनी हर ख्वाईश अपने माँ-बाप से पूरी करवाता है |  अगर न हो तो रोना, रूठना, मारना यह सारी बातें करता है | और उनके मात-पिता  भी ऐसे बच्चों को सम्भालने में शक्तिहीन हो जाते |  कुछ गलतियाँ बड़ों की भी है जो अपने बच्चों को लाड़प्यार में कमजोर बना रहे है | 

आज बच्चों का I.Q. test कराया जाता है | वह फिर भी अच्छा दिखाई देता है परंतु  भावनिक और आध्यात्मिक विकास पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है |  घर में भी आज हर किसी की दुनिया अलग बनी है | जो सामने है उनसे बात करने के लिए समय नही और जिन्हे है  पहचानते ही नही उनके साथ घंटो-घंटो बात करने में लगे हुए है |   पहले बच्चों को मैदानी खेल सिखाए जाते थे, अब मोबाइल पर ही सब खेल खेल लेते है |  एक-दूसरे के विचार सुनना, समझना, उनके साथ अपने को adjust करना —- यह नहीं कर पाते |  ऐसे बच्चों के सामने अगर कोई छोटी समस्या भी आ जाए तो उन्हें वह बड़ी लगती है क्यों कि वह अंदर से बिल्कुल कमजोर है |  डर, चिंता, परेशान होना, गुस्सा करना, चुप-चुप रहना —— यह आज सभी युवाओं में नजर आ रहा है |   आश्चर्य की बात तो यह है कि अपनी भावनाए वह अपने परिवार के सदस्यों को बताने के बजाए वह अपरिचित लोगों के साथ (councellor) करते है | क्या अपने ही उनको समझ नहीं पाते ? 

हम बड़े आसानी से कहते है, ‘ आज कल के बच्चे तो —-’ लेकिन उनको ऐसे  बनाने वाले कौन ?  छोटे बच्चे तो मिट्टी के घड़े के समान होते है |  उनको जैसा ढालो वैसे वह ढल जाएंगे |  आज महंगाई, स्पर्धा, वैयक्तिक जीवन —– इन सभी में शायद हम उनके मानसिक विकास के लिए समय नहीं दे पा रहे है लेकिन हम उनकी भावनाओं को समझने के लिए थोड़ा वक्त जरूर दे |   वह ऐसे क्यू कर रहे है उसे जानने की कोशिश करे |  शायद वह अपनी समझ, आयु —- के अनुसार सही भी हो |  एक बात को तो हम सभी को समझना ही होगा कि कोई भी इन्सान गलत नहीं लेकिन अलग है |  हर एक की choice अलग है, इस अनेकता, विविधता को हम स्वीकार करें |

अगर रिश्तो में हमें कुछ बदलाव लाना है तो पहले उन्हें वह जो है, जैसे है, स्वीकार करें | इस स्वीकार करने से उनको भी हम से सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी |   अगर हम उन्हें बार-बार दोष दिखाते  है माना ही हम उन्हें पसंद नहीं करते है यह बता रहे है |   और यह अगर बार-बार होता रहा तो रिश्तो में दरारे आना शुरू हो जाती है | हम इतनी दूरियाँ न बनाए जो कभी हम उन्हें आवाज दे तो वह उन्हें सुनाई भी न दे |   बहुत छोटी सी जिंदगी है, अपनों के साथ बहुत प्यारे रिश्ते बनाए |  ऐसा रिश्ता जो दूर होते हुए भी सदा पास होने का अनुभव कराए |   आज रिश्ते बहुत नाजुक हुए है इन्हे बनाने की कोशिश करें |   क्यों कि  आज के हमारे बच्चे, हमारा और देश का भविष्य है |  इन्हे बुरे संग से, बुरी आदतों से और साथ-साथ बुरे कर्म, बुरी सोच से बचाए | 

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