सरलता की मूर्ती हनुमान

 

रामायण मे अनेक विशेष अभिव्यक्ति मे से एक है हनुमानजी. हर मंगलवार और शनिवार को हिंदू जन संकटमोचन कहकर ऊनकी बहुत श्रद्धा से पूजा अर्चना करते है| हनुमान जी जिनका अनोखा रूप और अनोखी जन्म कहानी हम सूनते आये है| सिंदूरी रंग का रूप, वानर रूप मे दिखाया हुआ चेहरा और अनेक विशेषताओ से भरे हुए ऐसे हनुमान जी को हृदय से कोटी कोटी नमन| अंधविश्वास और धार्मिक आस्था के बीच एक पतली रेखा होती है| रामचरीत मानस मे तुलसीदासजी ने जनसामान्यो को समझाने के उद्देश्य से ही हनुमान की एक व्यक्ति रूप मे वर्णन किया है और उन्हे अपना गुरु का दर्जा दिया है|

हनुमानजी माता अंजनी और पिता केसरी के पुत्र थे| अंजनी अर्थात आंख और पिता केसरी अर्थात सिंह के समान अभूतपूर्व साहस और अभय की भावना| मनुष्य मे अच्छाई और बुराई आखों से प्रवेश होती है| ये दैहिक आंखे नही लेकिन मन की आंखे| हनुमानजी का जन्म विशुद्ध चिंतन व सिंह के समान अभय व्यक्तिद्वारा ही संभव है| हनुमानजी के नाम मे ही ऊनके गुणो की पहचान है| कहते है ना ‘जैसा नाम वैसा काम’| हनु का अर्थ है ग्रीवा, चेहरे के नीचेवाला भाग अर्थात ठोडी, मान का अर्थ है गरिमा, बढाई, सम्मान| इसप्रकार हनुमान का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसने  अपने मान सन्मान को अपनी ठोडी के नीचे रखा है, अर्थात जीत लिया है| जिसने अपने मान सन्मान को जीत लिया है, उसके प्रभाव से मुक्त हो गया है वही हनुमान हो सकते है| हनुमान का दूसरा नाम बालाजी भी है जिसका तात्पर्य है बालक| हमारे ग्रंथो मे हनुमान जी बालक की तरह दिखाए है| बालक की तरह निष्कलुष ह्रदयवाला व्यक्ति सन्मान पाने की लालसा इससे मुक्त रह सकता है| सही अर्थ्ओ मे ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है| श्रीराम जी के दरबार मे भी उन्हे हमेशा सबसे नीचे भूमी पर, सेवक के रूप मे हाथ जोडे बैठे हुए दिखाया जाता है|

लेकिन कई बार ये सवाल उठता है की ऐसे महान चरित्र को वानर की तरह क्यो चित्रित किया गया है? ऐसा प्रश्न आपके मन मे भी जरूर उठता होगा| कहा ऐसा महान व्यक्तित्व और कहा वानर रूप, जो एक निकृष्ट जानवर माना जाता है| वास्तव मे वानर प्रतीक है मनुष्य के अविवेकी मन का| हमारा मन भी वानर के समान सदा भटकता रहता है, अत्यंत चलायमान होता है| और मन का नियंत्रण बहुत कठीण कार्य है| हनुमान पवन पुत्र है अर्थात पवन से भी तेज चलनेवाले इस मन के वे पुत्र है| अब बताईये एक तो वानर की उपमा और दुसरी पवन की, दोनो भी अत्यंत चंचल| उनको वानराधीश कहने का तात्पर्य यही है की वे मन रूपी वानर का अधिपति है, स्वामी है| ऊनका अपनी चंचल इंद्रियो पर नियंत्रण है| केवल मन का स्वामी ही रामरूपी ईश्वर का सर्वोत्तम भक्त हो सकता है और धर्म के कार्यो मे निष्काम भाव से भाग ले सकता है|

यह तात्पर्य है उस रमण करनेवाले तत्व से जो हर जगह समानरुप से व्याप्त है| दशरथ नंदन राम तो उसे व्यक्त करने के प्रतीक मात्र है| निष्कामता हर गुणो की जननी है| हनुमान निष्काम गुण की प्रतिमूर्ती है इसलिए वे कहते है ‘राम काज किये बिन मोह कहा विश्राम’| वे पुरी तरह से राम के प्रति समर्पित है बिना  किसी आश के| इसलिए बहुत ही सुंदर चित्र दिखाते है की हनुमान जी के ह्रदय को चीर के देखे तो उसमे भी राम ही बसे है| असीम शक्तीओ से संपन्न होते हुए भी आज्ञाकारी और नम्र स्वभाव से पहचाने जानेवाले हनुमानजी की विशेषताओ का सिर्फ हम वर्णन ना करे लेकिन ऊनके जैसे बनने की चाहना भी रखे| क्योकि आज हम बडे चाव से रामायण सूनते देखते है लेकिन उनसे अच्छी बाते धारण नही कर पाते| हनुमान जयंती के दिन सिर्फ सूनने का मजा लेने के बजाय ऊनके जैसा बनने का भी लक्ष रखे| जो रिश्ते हमने बनाए है ऊनमे वफदार, प्रभू प्रीती मे समर्पित वृत्ती, समस्याओ का सामना करते वक्त साहस .. .. ऐसे कई गुण व्यावहारिक जीवन मे अपनाने का प्रण करे यही सच्चे अर्थ से हनुमान जयंती मनाना होगा|

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19 Comments

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