अपनों के साथ शतरंज न खेले

      बचपन मे हर एक को खेलना अच्छा लगता है| बाल्यावस्था से वृद्ध अवस्था तक हर एक को कोई न कोई खेल खलेना या देखना पसंद होता है| क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल से लेकर शतरंज, ताश कई खेल हम खेलते है, उसका मजा लेते है| कुछ खेल कई मिलकर खेलते है तो कई एक दुसरे मे खेले जाते है| खेल कोई भी हो लेकिन हार-जीत, लाभ-हानी यह तो होता ही है| एक जीतता है तो दूसरा हारता है| हमेशा एक ही जीते ऐसा नही, कभी हार तो कभी जीत होती रहती है| जो भी खेल का परिणाम हो उसे सहर्ष स्वीकार करना समझदारी है| परंतु कई बार ये भी देखते है की खेलते-खेलते कई खिलाडी आपस मे ईर्ष्या करना या बदला लेने की चाहना रखते है| खेल के नियमों को तोडकर बदला लेते है| ऐसी कई बाते होते हुए हम देखते है|

    ‘LIFE IS A GAME’ हमारे जीवन मे भी वही होता है| वास्तव मे परिस्थितीया एक खेल है| हमे उसे खेल समझकर खलेना है न की जिस व्यक्ति से परिस्थिती आई है उसके साथ नफरत या बदले की भावना रखते  है| लेकिन व्यावहारिक जीवन मे आज हमसे ये गलती   कही ना कही हो जाती है| इस जीवन के खेल का नियम है ‘जो जैसा करेगा उसे वैसा मिलेगा’| इस नियम को भूल हम उनसे बदला लेना, गुस्सा करना, नफरत करना शुरु करते है और यह सब करना सही भी समझते है| आज किसीको धोके मे रखना, धोका देना यह तो बिल्कुल साधारण सी बात हुई है| और ये सारे खेल जो हमारे बहुत निकट के है, जिन के अंग संग रते है उन्ही के साथ खेलते है| इसलिए आज के संबंध जटिल बनते जा रहे है| पती-पत्नी, बालक-पालक, मित्र-संबंधी ये सारे संबंध सुख देने-लेने के लिए बने है, दुःखों मे साथ निभाने के लिए है लेकिन आज इन्ही संबंधो मे हम धोका देते है| अपनो के साथ ही शतरंज खेलते है|

     आज कल विज्ञान ने कई प्रभावी साधन दिए है जिससे  हम संबंधो को मजबूत और गहरा बना सकते है| लेकिन उसका इस्तमाल हम गलत तरीके से करते है| facebook से हम कई मित्र बना लेते है| लेकिन अपनी सही पहचान न देकर झुठ, कपट करते है| दुसरे नाम से अपनो के साथ ही छल करते रहते है| रिश्तो मे विश्वास बढाने के बजाए और ही रिश्तो से विश्वास उठता जा  रहा है| इसलिए कहते है इन्सान को पहचानना बडा मुश्किल है| जो ऐसे दुसरो के साथ खेल करते है वह तो उन बातो का मजा लेते है, सामनेवाले की भावनाओ के साथ खिलवाड करते है| मगर ‘आज मजा और कल सजा’ जरूर मिलती है| क्योकि इस जीवन का नियम है ‘जैसा करोगे वैसा पाओगे’| भले किसी को सही रूप से पहचाने मे समय लगता है लेकिन हमने जो उनका समय, संकल्प, शक्ति को गलत तरीके से नष्ट कीया, उसका भी तो कर्म का खाता बनता है| सुख देंगे तो सुख मिलेगा और दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा यह तो है ही लेकिन हमारे कारण किसी की भावनाओ को ठेच पहुचती है या मन दर्द का अनुभव करता है तो उसका भी रिटर्न हमारे पास आज नही तो कल आएगा| बोल से दुःख दिया तो बोल से ही दुःख मिलता है वैसे ही संकल्पो से दुःख दिया तो हमारा मन कभी खुशी का अनुभव नही कर सकता, मन उलझा हुआ रहेगा| इसलिए व्यक्तिओंके साथ ऐसा छल (खेल) न करे|

      यह जीवन खेल समझकर जरूर खेले अर्थात जब कोई बात आती है, तब उसे पार करने के लिए हम अपनी सारी शक्ति, बुद्धी लगाए| फिर उसके परिणाम को भी स्वीकार करे| आगे क्या करना है उसकी समझ बढाकर अब कैसे खलेना है उसे समझ ले| लेकिन किसी  व्यक्ति विशेष के लिए मन मे गांठ बांधकर न चले| वास्तव मे हमारी कश्मकश बुराईओ के साथ है न की व्यक्तिओं के साथ| हमने महाभारत मे भी देखा की खेल खेलते कहा रणभूमी तक पहुचे| एक दुसरे से बदला लेने के लिए आमने सामने आये| यह सारे दृष्टान्त हमारे जीवन से जुडे हूए है| अगर कुछ हारने की शक्ति नही है या खेल की समझ नही है तो ऐसे खेल से दूर रहे| अर्थात जीवन मे जो है, जैसा है उसे स्वीकार करके उसीमे गुजारा करे| अगर कुछ पाना है तो खेल मे उतरे| कभी हार या जीत हो उसे दिल से स्वीकार करना भी सिख ले |

      हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण है जिन्होने अपनी जीवन मे कई बार हारने का अनुभव कीया| लेकिन फिर भी उस हार से सिखकर आगे बढे| कोई वैज्ञानिक, |       व्यापारी, कलाकार, खिलाडी बने| हर मिश्किल परिस्थितीओं को पार करके दिखाया| अपने अपने क्षेत्र मे विशेष बनकर दिखाया लेकिन कर्मो मे झुठ, कपट, छल को नही अपनाया| उन्हे पता था अच्छा कर्म हमेशा मन को सुगून देता है और छल बैचैनी| जीवन का आनंद तब है जब अपनो के सामने हारकर उनकी जीत की खुशी मनाए|

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